Friday, 7 August 2020

नक्षत्रों के आधुनिक नामकरण पर संशय

 नक्षत्रों के आधुनिक नामकरण पर संशय


जब भी भारतीय ज्योतिष शास्त्र से बाहर जा कर नक्षत्रों के विषय में खोजता हूँ तो ऐसा लगता है की अन्य दुनिया में चला गया हूँ।  एक ऐसी दुनिया जो भारत को जानती ही नहीं थी।  फिर जब भारतीय विद्वान ज्योतिषियों से चर्चा करता हूँ ऐसा लगता है मैं आधुनिक सभ्यता से दूर हूँ।  क्यों कि जब मैं रोहिणी नक्षत्र की चर्चा करता हूँ तो विद्वान ज्योतिषी Aldebran के बारे में बताते हैं; जब मैं आर्द्रा कहता हूँ तो वे Betelgeuse कहते हैं।   


वास्तव में ऐसे विद्वान ज्योतिषी  International Astronomical Union के नामकरण के प्रति निष्ठावान देखे जाते हैं।  IAU एक अंतर्राष्ट्रीय खगोल की संस्था है।  यह संघ 1909 में स्थापित हुआ था।  भारत की सदस्यता इसमें 1965 से हुई थी।  IAU ने आरंभ से ही भारतीय खगोल ज्ञान को नजरअंदार करके यूरोपीय व अरबी खगोल को महत्व दिया।  इसी के प्रभाव में आकर सभी ग्रहों व नक्षत्रों का नामकरण किया गया।  मात्र 1200ई की पुस्तकों के आधार पर नामकरण किए गए हैं।  वहीं चार हजार सालों या उससे भी अधिक सालों से प्रयोग किए जाने वाले वैदिक नामों का तिरस्कार किया गया।

  

यह तो विदेशियों की बात है, आश्चर्य होता है जब निष्ठावार भारतीय ज्योतिषी भी IAU का अनुसरण करते हुए विदेशी नामों से ही नक्षत्रों को पहचानने में गर्व महसूस करते है।  इस प्रकार से विद्वान अपने ज्ञानी होने का प्रमाण देते हैं।  भारतीय नक्षत्रों को कम से कम चार हजार सालों से जिन नाम से पुकारते रहे आज उन्हीं को विदेशी नाम से पुकारने का क्या मतलब है।  


भारतीय ज्योतिष विद्वानों को अपनी सभ्यता का गौरव बनाए रखना चाहिए।  स्वदेशीय नामों से ही नक्षत्रों को पहचानने में गौरव महसूस करना चाहिए तथा प्रचारित करना चाहिए।


आप क्या पसंद करते हैं रोहिणी या Aldebran; अश्विनी या Sheratan; चित्रा या Spica; पुनर्वसु या Pollux?


जरूर बताएँ।  तथा अन्य ज्योतिष मित्रों को भी इस विदेशी नामकरण से जागरूक करें।


धन्यवाद।

शशिकान्त मिश्र

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