Monday, 22 May 2023

सृष्टि के सात स्तर

 

यह प्रकृति पुरुष और स्त्री के मैथुन शक्ति के अनुसार विकसित और प्रकाशित हुई है

 

प्रकृति क्या है?

ब्रह्मणः सकाशान्नानाविचित्रजगन्निर्माणसामर्थ्यबुद्धिरूपा ब्रह्मशक्तिरेव प्रकृतिः।।

अर्थात जिसमें विचित्र जगत निर्माण सामर्थ्य है और जो ब्रह्म से ही उत्पन्न होती है उस ब्रह्म शक्ति को प्रकृति कहते है।

 

सृष्टि के सात स्तर

 

धर्म विज्ञान शास्त्र के अनुसार सृष्टि के अनेक स्तर होते हैं।  धर्मवेत्ताओं ने इस स्तरों का वर्गिकरण किया है –

प्रथम स्तर – मानसी सृष्टि

द्वितीय स्तर – लिंग-भेद विचारहीन सृष्टि

तृतीय स्तर – अर्द्धनारीश्वर की तरह स्त्री पुरुष दोनों की सृष्टि (Bisexual or hermaphrodites)

चतुर्थ स्तर – स्त्री पुरुष से अलग तो हो जाती है, किन्तु स्थूल सम्बन्ध के द्वारा मैथुन सृष्टि की आवश्यकता न स्त्री के लिए और न पुरुष के लिए हुआ करती है। (This concept is supported in “The evolution of Sex” and Contemporary Science series.  Their theories conclude that in an ideal state of humanity, men and women may remain in form, but propagation may go on without conjugation only through the women)

पञ्चम स्तर - यज्ञीय सृष्टि, इसमें यज्ञ द्वारा प्राप्त चरु ही वीर्य का कार्य कर देता है। 

षष्ठ स्तर – पूर्व की सब उत्तम शक्तियों का ह्रास हो जाने पर मैथुन सृष्टि ही अन्तिम उपाय रह जाता है।  किन्तु स्त्री पुरुष दोनों के ही सच्चरित्र, आचारवान तथा संयमशील रहने से प्रथमतः ऐसी सृष्टि भी अमोघ रहती है।  और इससे सु-सन्तान की उत्पत्ति हुआ करती  है।  (आजकल प्रचलित)

सप्तम् स्तर- ब्रह्मचर्य, सदाचार, संयम सभी का अभाव होने के कारण स्त्री बन्ध्या और पुरुष निर्वीर्य्य होकर जनन शक्तिहीन होते हैं। (आगामी जहाँ जीन्स के प्रयोग का वैज्ञानिक तरीका होगा)

 

फलित ज्योतिष में प्रयोग

जिस प्रकार विवाह से विभिन्न प्रकार है वैसे ही सृष्टि के वृद्धि के भी विभिन्न प्रकार हैं।   ज्योतिष में जातक के फलित करते समय अकसर हम श्रीराम, कृष्ण, पाण्डव, द्रौपदी आदि के जन्म कुण्डलियों का विश्लेषण करते हैं।  परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि चतुर्थ, पंचम, षष्ठ और सप्तम् प्रकार की ज्ञात सृष्टियों में जन्म की प्रक्रिया, उद्देश्य और विज्ञान भिन्न-भिन्न हैं।  इस लिए जातक के नियम भी समान रूप से लागू नहीं किए जाने चाहिए।

Source of Information – धर्म विज्ञान – द्वितीय खण्ड, श्री स्वामी दयानन्दजी, प्रकाशक – श्री वाणी पुस्तक माला, जगतगंज, बनारस, 1942, पृष्ठ 556

Saturday, 20 May 2023

पुराणों में वर्णित आश्चर्य क्षेत्र - कलाप ग्राम

 

पुराणों में वर्णित आश्चर्य क्षेत्र - कलाप ग्राम


 

कलापग्राम नामक एक उत्तम एवं रहस्यमयी स्थान का विवरण पुराणों में मिलता है।  ग्रंथो के अनुसार कलापग्राम में चौरासी हजार ब्राह्मण निवास करते थे।  यहाँ सभी वेदाध्ययन से सुशोभित थे तथा तपस्या के मूर्तिमान् स्वरूप थे।  यह ग्राम सौ योजनतक फैला हुआ माना जात है।  केदारक्षेत्र से सौ योजन आगेतक हिमसंयुक्त प्रदेश में यह स्थान है। उसके सौ योजन आगे बालू का समुद्र बताया जाता है।  उसके बाद सौ योजन विस्तारवाला प्रदेश कलापग्राम नामक प्रदेश है।  यह प्रदेश भूमि पर स्वर्ग माना जाता है।

 

स्कंद पुराण के माहेश्वर-कुमारिका खण्ड में कहा गया है कि नारद मुनि कलाप ग्राम आकाश मार्ग से गए थे।  सौ योजन तक फैला हुआ यह ग्राम नाना प्रकार के वृक्षों से छाया प्राप्त करता है।  अग्निहोत्र से उठे हुए धुएँ का प्रवाह वहाँ कभी शान्त नहीं होता है।  कलाप ग्राम वह स्थान है, जहाँ सत्युग के लिए सूर्यवंश, चन्द्र वंश तथा ब्राह्मण वंश का बीज शेष और सुरक्षित है।

 

मार्ग में जाने का मार्ग

कलापग्राम पहुँचने के दो रास्ते हैं –

·       वायु मार्ग और

·       बिल मार्ग।

अन्न और जल का त्याग करके उपवासपूर्वक दक्षिण दिशावर्ती भगवान कार्तिकेयकी आराधना करें।  कार्तिकेयजी जब साधक को पापरहित हुआ मानते हैं तब स्वप्न में प्रकट होकर आदेश देते हैं कि तुम अभीष्ट स्थान की यात्रा करो।  कार्तिकेयजी के स्थान से पश्चिम एक बहुत ही बड़ी गुफा है, वह सात सौ योजन दूरतक गयी हुई है।  कार्तिकेय जी की आज्ञा मिलने के पश्चात् उसी में प्रवेश करके आगे बढ़ना चाहिये।  इस गुफा के भीतर मरकतमणि का एक शिवलिंग है, जो सूर्यके समान प्रकाश करने वाला है।  उस शिवलिंगके आगे अत्यन्त स्वच्छ सुवर्णके रंगकी मिट्टी मिलती है।  वहाँ शिवलिंगको नमस्कार करके तथा उस पीली मिट्टी को हाथ में लेकर स्तम्भ तीर्थ मे आना चाहिए।  वहीं भगवान् कुमार तथा वराहदेवकी आराधना करके आधी रात होने पर कुएँ से जल निकालना चाहिये।  उस जल और मिट्टी से दोनों आँखों में अञ्जन करना चाहिये।  साथ ही सम्पूर्ण शरीरमे उस जल और मिट्टी का उबटन लगाना चाहिये।  उस अञ्जन के प्रभाव से कदाचित् आठ कदम चलनेपर उसे एक  सुन्दर बिल दिखयी देता है।  तदन्तर उस बिलके भीतर से होकर वह यात्रा करे।  वहाँ कारीप नामक बड़े भयंकर कीड़े होते हैं, परंतु वे उस उबटल के प्रभाव से साधक को डँसते नहीं हैं।  उस बिल के भीतर भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी सिद्ध पुरुषोंका दर्शन करते हुए साधक आगे बढ़ता है और परम उत्तम कलाप-ग्राम पहुँच जाता है।  वहाँ मनुष्यों की आयु चार हजार वर्षकी बतलायी गयी है।  वहाँ सब लोग फलोंका ही भोजन करते हैं।

सृष्टि के सात स्तर

  “ यह प्रकृति पुरुष और स्त्री के  मैथुन   शक्ति के अनुसार विकसित और प्रकाशित हुई है ”   प्रकृति क्या है? ब्रह्मणः सकाशान्नानाविचित्...