“यह प्रकृति पुरुष और स्त्री के मैथुन शक्ति के अनुसार विकसित और प्रकाशित हुई
है
”
प्रकृति क्या है?
ब्रह्मणः सकाशान्नानाविचित्रजगन्निर्माणसामर्थ्यबुद्धिरूपा ब्रह्मशक्तिरेव
प्रकृतिः।।
अर्थात जिसमें विचित्र जगत निर्माण सामर्थ्य है और जो ब्रह्म से ही उत्पन्न
होती है उस ब्रह्म शक्ति को प्रकृति कहते है।
सृष्टि के सात स्तर
धर्म विज्ञान शास्त्र के अनुसार सृष्टि के अनेक स्तर होते हैं। धर्मवेत्ताओं ने इस स्तरों का वर्गिकरण किया
है –
प्रथम स्तर – मानसी सृष्टि
द्वितीय स्तर – लिंग-भेद विचारहीन सृष्टि
तृतीय स्तर – अर्द्धनारीश्वर की तरह स्त्री पुरुष दोनों की सृष्टि (Bisexual or hermaphrodites)
चतुर्थ स्तर – स्त्री पुरुष से अलग तो हो जाती है, किन्तु स्थूल
सम्बन्ध के द्वारा मैथुन सृष्टि की आवश्यकता न स्त्री के लिए और न पुरुष के लिए
हुआ करती है। (This concept is supported in “The evolution of Sex” and
Contemporary Science series. Their
theories conclude that in an ideal state of humanity, men and women may remain
in form, but propagation may go on without conjugation only
through the women)
पञ्चम स्तर - यज्ञीय सृष्टि, इसमें यज्ञ द्वारा
प्राप्त चरु ही वीर्य का कार्य कर देता है।
षष्ठ स्तर – पूर्व की सब उत्तम शक्तियों का ह्रास हो
जाने पर मैथुन सृष्टि ही अन्तिम उपाय रह जाता है। किन्तु स्त्री पुरुष दोनों के ही सच्चरित्र,
आचारवान तथा संयमशील रहने से प्रथमतः ऐसी सृष्टि भी अमोघ रहती है। और इससे सु-सन्तान की उत्पत्ति हुआ करती है। (आजकल प्रचलित)
सप्तम् स्तर-
ब्रह्मचर्य, सदाचार, संयम सभी का अभाव होने के कारण स्त्री बन्ध्या और पुरुष
निर्वीर्य्य होकर जनन शक्तिहीन होते हैं। (आगामी जहाँ जीन्स के प्रयोग का वैज्ञानिक तरीका होगा)
फलित ज्योतिष में प्रयोग
जिस प्रकार विवाह
से विभिन्न प्रकार है वैसे ही सृष्टि के वृद्धि के भी विभिन्न प्रकार हैं। ज्योतिष में जातक के फलित करते समय अकसर हम
श्रीराम, कृष्ण, पाण्डव, द्रौपदी आदि के जन्म कुण्डलियों का विश्लेषण करते
हैं। परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि चतुर्थ,
पंचम, षष्ठ और सप्तम् प्रकार की ज्ञात सृष्टियों में जन्म की प्रक्रिया, उद्देश्य
और विज्ञान भिन्न-भिन्न हैं। इस लिए जातक
के नियम भी समान रूप से लागू नहीं किए जाने चाहिए।
Source of
Information – धर्म विज्ञान –
द्वितीय खण्ड, श्री स्वामी दयानन्दजी, प्रकाशक – श्री वाणी पुस्तक माला, जगतगंज,
बनारस, 1942, पृष्ठ 556