Sunday, 25 July 2021

यज्ञोपवीत संस्कार एवं धारण करने की विधि


यज्ञोपवीत संस्कार एवं धारण करने की विधि

हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणा प्रतिष्ठिताः।

हृदि प्राणश्च ज्योतिश्च त्रिवृत्सूत्रं च यन्महत्।  हृदि चैतन्येतिष्ठति।

 

(हमारे) हृदय में देवताओं का निवास स्थान है, हृदय में प्राण प्रतिष्ठित हैं।  हृदय में प्राण एवं ज्योति (ऊर्जा) है।  इन तीन स्वरुपों में हमारे अन्दर परमात्मा निवास करते हैं।  माना जाता है कि तीन तन्तुओं वाला सूत्र (यज्ञोपवीत) इस तथ्य का  सूचक है।  परमात्मा हृदय में चैतन्य रुप में रहता है।

 

यज्ञोपवीत के धारण करने की प्रथा कब से प्रारंभ हुई, इसका कोई प्रमाण नहीं है।  परन्तु माना जाता है कि यह प्रथम प्रजापति के साथ ही उत्पन्न हुआ है, जिस का अनुपालन आरंभ से ही किया जाता रहा है।  जिस प्रकार सूत्र में मनके पिरोए जाते हैं, उसी प्रकार परब्रह्म में समस्त विश्व पिरोया हुआ है। 

यज्ञोपवीत यह प्रकट करता है कि परब्रह्म हृदय में निवास करता है,  इसलिए यज्ञोपवीत को सूत्र कहा जाता है।  सूत्र का अर्थ है ‘परमपद’।  इस सूत्र के स्वरुप को जानने वाला ही वेद का अधिकारी तथा ज्ञाता हो सकता है।   ग्राहस्थ और वानप्रस्थ को दो यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए। 

निःसंदेह, द्विजों को यज्ञोपवीत सदैव धारण किए रहना चाहिए।  ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ और वानप्रस्थ – तीनों आश्रमों में यज्ञोपवीत अनिवार्य रूप से धारण करना चाहिए।  शास्त्रोक्त विधि से यज्ञोपवीत धारण करना एवं सदैव नियमों का पालन करनें का कोई विकल्प नहीं है।  नियमों की अवहेलना करने वाला दोषी होता है तथा दुष्परिणाम भोगता है।  यज्ञोपवीत की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 

यज्ञोपवीत का अशुद्ध होना

·       कंधे से सरक कर बाँये हाथ से नीचे गिर जाना।

·       किसी धागे का टूट जाना।

·       शौच आदि के समय पर कान पर रखना भूल जाना।

·       अस्पृश्य अंगों से स्पर्श हो जाना।

यज्ञोपवीत को बदलने की आवश्यकता

प्रयत्न यही होना चाहिए कि जनेऊ कम से कम बदलने की आवश्यकता पड़े।  परंतु, निम्नलिखित अवस्थाओं में या यज्ञोपवीत के अशुद्ध होने पर उसे निश्चय ही बदल लें।

·       उपाकर्म में

·       जनना शौच और मरणाशौच में

·       श्राद्ध, यज्ञ आदि में

·       चन्द्र एवं सूर्यग्रहण के उपरांत

 

नूतन यज्ञोपवीत धारण विधि

 

ब्रह्ममुहूर्त्त में उठ कर शौच आदि मे निवृत होकर शुद्धी, आचमन, प्राणायाम आदि के बाद नूतन यज्ञोपवीत धारण को अभिमंत्रित करें तथा धारण करने का संकल्प लें।  अपने वर्ण के अनुकूल पवित्र जनेऊ अपने कुलके गुरु (अथवा मंदिर के ब्राह्मण) से प्राप्त करें।   

यज्ञोपवीत पूजन

श्रावण में यज्ञोपवीत की पूजा करके वर्ष भर के लिए रखने का नियम है।  अन्यथा, निम्न विधि से यज्ञोपवीत का संस्कृत करें।

·       यज्ञोपवीत को पलाश या पीपल के पत्ते पर या शुद्ध पात्र में रखें। 

·       जल छिड़क कर शुद्ध करें।

·       निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हए अक्षत अथवा एक-एक फूल को यज्ञोपवीत पर अर्पण कर तन्तुओं और ग्रन्थों में देवताओं का आवाहन करें।

नौ तन्तुओं में आवाहन –

1.    प्रथमतन्तौ ॐ ओंकारमावाहयामि।

2.    द्वितीयतन्तौ ॐ अग्निमावाहयामि।

3.    तृतीयतन्तौ ॐ सर्पानावाहयामि।

4.    चतुर्थतन्तौ ॐ सोममावाहयामि।

5.    पञ्चमतन्तौ ॐ पितृनावाहयामि।

6.    षष्ठमतन्तौ ॐ प्रजापतिमावाहयामि।

7.    सप्तमतन्तौ ॐ अनिलमावाहयामि।

8.    अष्टमतन्तौ ॐ सूर्यमावाहयामि।

9.    नवमतन्तौ ॐ विश्वान् देवानावाहयामि।

ग्रन्थों में आवाहन –

10. प्रथम ग्रन्थौ ॐ ब्रह्मणे नमः, ब्रह्माणमावाहयामि।

11. द्वितीय ग्रन्थौ ॐ विष्णवे नमः, विष्णुमावाहयामि।

12. तृतीय ग्रन्थौ ॐ रुद्राय नमः, रुद्रमावाहयामि।

पूजन

प्रणवाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः। 

इस मंत्र का उच्चारण करके यथास्थानं न्यसामि कहकर उन तन्तुओं पर हल्दी, कपूर-केसर युक्त चन्दन आदि लगा कर पूजा करें।

अभिमन्त्रित करना

पूजा के बाद यज्ञोपवीत को दस बार गायत्री मंत्र से अभिमन्त्रित करें।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्।  

मंत्र का अर्थभूः सत् (सूर्य के द्वारा प्रकाशित क्षेत्र), भुवः चित् (पृथ्वी से सूर्यमण्डल के बीच का क्षेत्र), स्वः आनन्द स्वरुप (सूर्यमण्डल से ध्रुवमण्डल के बीच का क्षेत्र) सवितुः देवस्य सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्माके तत् वरेण्यम् भर्गः उस प्रसिद्ध वरणीय तेज का (हम) ध्यान करते हैं यः जो परमात्मा नः हमारी धिवः बुद्धि को (सत् की ओर) प्रचोदयात् प्रेरित करे।

यज्ञोपवीत धारण करने का संकल्प

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः

ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे ..........स्थाने ..........नामसंवत्सरे ..........ऋतौ ..........मासे कृष्ण/शुक्ल पक्षे ..........तिथौ ..........दिने ..........काले ..........गोत्रः, ..........शर्मा (वर्मा, गुप्तः) अहं प्रातः काले सर्वकर्मसु शुद्धयर्थम् श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं उपात्तदुरितक्षयपूर्वक श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं च यज्ञोपवीत धारणं करिष्ये।

संकल्प का अर्थ –  ओंकारस्वरुप भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए आज ब्रह्माजी के दूसरे परार्ध (51वें वर्ष में) में श्री श्वेतवाराह नाम कल्प में वैवस्वत मन्वन्तर में अठ्ठाइसवें (28वें) कलियुग में कलियुग के पहले चरण में बुद्ध के अवतार वाले युग में पृथ्विलोक पर भरत खण्ड में भारत देश में ....... नगर में ....... नामक संवत्सर में .......  ऋतुमें .......  महिनें में कृष्ण/शुक्ल पक्षमें ....... तिथि में ....... वार में ....... गोत्र का ....... शर्मा (वर्मा, गुप्ता) नाम वाला मैं, प्रातः काल में सभी कार्यों के लिए शुद्धि के लिए श्रुतियों, स्मृतियों, पुराणों में उल्लिखित फल प्राप्ति के लिए और श्रीपरमेश्वर को प्रिय लगने केलिए यज्ञोपवीत धारण करुँगा।

नोट - संकल्प में रिक्त स्थान भरने के लिए परिशिष्ठ देखें।

यज्ञोपवीत धारण

विनियोग – निम्नलिखित विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़ें।

ॐ यज्ञोपवीतमिति मन्त्रस्य परमेष्ठी ऋषिः, लिंगोक्ता देवताः, त्रिष्टुप् छन्दः, यज्ञोपवीत धारणे विनियोगः।

विनियोग का अर्थ – यज्ञोपवीतमिति... मंत्र के परमेष्ठी ऋषि हैं, लिंगोक्ता देवता हैं, त्रिष्टुप छन्द है। इस मंत्र का प्रयोग का यज्ञोपवीत धारण करने में होता है।

धारण – निम्न मंक्ष पढ़कर एक जोड़ा जनोऊ धारण करें।

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं   प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं     यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

श्लोक का अर्थ – यज्ञोपवीत परम पवित्र है।  यह प्रथम प्रजा-पति के साथ उत्पन्न हुआ आयुष्य देने वाला है – ऐसा समझ कर तुम उत्तम और उज्जवल यज्ञोपवीत धारण करो,  यह यज्ञोपवीत तुम्हारे लिए बलरुप सिद्ध हो।

ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि।

आचमन

नूतन यज्ञोपवीत धारण करने के बाद आचमन करें।

जीर्ण यज्ञोपवीत का त्याग

निम्न मंत्र पढ़कर पुराने यज्ञोपवीत को कण्ठी जैसा बनाकर सिरपर से पीठकी ओर से निकालकर उसे जल में प्रवाहित कर दें।

एतावद्दिनपर्यन्तं   ब्रह्म    त्वं    धारितं    मया।

जीर्णत्वात् त्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम्।।

गायत्री मंत्र पाठ

यथा शक्ति गायत्री मंत्र का पाठ करें।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्।  

मंत्र का अर्थभूः सत् (सूर्य के द्वारा प्रकाशित क्षेत्र), भुवः चित् (पृथ्वी से सूर्यमण्डल के बीच का क्षेत्र), स्वः आनन्द स्वरुप (सूर्यमण्डल से ध्रुवमण्डल के बीच का क्षेत्र) सवितुः देवस्य सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्माके तत् वरेण्यम् भर्गः उस प्रसिद्ध वरणीय तेज का (हम) ध्यान करते हैं यः जो परमात्मा नः हमारी धिवः बुद्धि को (सत् की ओर) प्रचोदयात् प्रेरित करे।

भगवान को अर्पण

निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवान् को अर्पित करें।

ॐ तत्सत् श्रीब्रह्मार्पणमस्तु।

हाथ जोड़कर भगवान का ध्यान करें।


 

नित्यहोम-विधि

 



नित्यहोम-विधि

 

पूर्व दिशा की ओर मुख कर नित्य होम के लिए बैठें।

आचमन

निम्नलिखित एक-एक मंत्र को पढ़कर आचमन करें।

ॐ केशवाय नमः।         ॐ नारायणाय नमः।                  ॐ माधवाय नमः।

आचमन के बाद अँगूठे के मूलभाग से होठों को दो बार पोछें। आगे दिए मंत्र का उच्चारण करते हुए हाथ धोएँ।

ॐ हृषिकेशाय नमः।

मार्जन

विनियोग मंत्र पढ़ कर पृथ्वी पर जल छोड़ें।

ॐ अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता, गायत्रीछन्दः हृदि पवित्रकरणे विनियोगः।

विनियोग का अर्थ – अपवित्रः पवित्रो... मंत्र के वामदेव ऋषि हैं, विष्णु देवता हैं, गायत्री छंद है।  इस मंत्र का प्रयोग मन को पवित्र करने में होता है।

निम्नलिखित मंत्र पढ़कर अपने शरीर पर एवं सामग्री पर जल छिड़कें। इस अभिमंत्रित जल से शरीर पवित्र एवं पूजा करने योग्य होजाता है।

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा।

यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।

श्लोक का अर्थ – (मनुष्य) अपवित्र या पवित्र अथवा किसी भी अवस्था में हो, यदि कमल नयन भगवान विष्णु का स्मरण करता है तो वह  बाहर से तथा भीतर से (हर प्रकार) से पवित्र हो जाता है।

आसन पवित्र करना

विनियोग मंत्र पढ़ कर पृथ्वी पर जल छोड़ें।

ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्मो देवता आसनपवित्रकरणे विनियोगः।

विनियोग का अर्थ – पृथ्वीति... मंत्र के मेरुपृष्ठ ऋषि हैं, सुतल छंद है, कूर्म देवता हैं।  इस मंत्र का प्रयोग आसन पवित्र करने में होता है।

निम्नलिखित मंत्र पढ़कर आसन पर जल छिड़कें।

ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका   देवि! त्वं विष्णुना धृता।

त्वं     धारय  मां   देवि!     पवित्रं   कुरु  चासनम्।।

श्लोक का अर्थ – हे! पृथ्वी देवि!  आपने समस्त लोक को धारण कर रखा है और आप को भगवान विष्णु ने धारित किया है।  आप मुझे भी धारित करें तथा मेरे आसन के पवित्र करें।

प्राणायाम

ॐकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्दैवी गायत्री छन्दः अग्निः परमात्मा देवता शुक्लो वर्णः सर्वकर्मारम्भे विनियोगः।

विनियोग का अर्थ – ॐ कारस्य.... मंत्र के ब्रह्मा ऋषि हैं, देवी गायत्री छन्द हैं, परमात्मा अग्नि देवता हैं तथा शुक्ल वर्ण है,  इस मंत्रका प्रयोग सभीकार्य के आरंभ में होता है।

ॐ सप्तव्याहृतीनां विश्वामित्रजमदग्निभरद्वाजगौतमात्रिवसिष्ठकश्यपा- ऋषयोगायत्र्युष्गिगनिष्टुब्बृहतीपङ्क्ति त्रिष्टुब्जगत्यश्छन्दांस्यग्निवाय्वादित्य बृहस्पतिवरुणेन्द्रविष्णवो देवता अनादिष्टप्रायश्चित्ते प्राणायामे विनियोगः।

विनियोग का अर्थ – ॐ सप्तव्याहृतीनां..... मंत्र के विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ और कश्यप (ये सात साक्षात कर्ता) ऋषि हैं। गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगत्य (ये सात) छंद हैं।  अग्नि, वायु, आदित्य, बृहस्पति, वरुण, इन्द्र, विष्णु देवता हैं। इस मंत्र का (व्याहृतियों का) प्रयोग अनादिष्ट प्रयाश्चितात्मक प्राणायाम में होता है।

ॐ तत्सवितुरिति विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता प्राणायामे विनियोगः।

विनियोग का अर्थ – ॐ तत्सवितुरिति.... मंत्र के विश्वामित्र ऋषि हैं, गायत्री छन्द हैं, सविता (सूर्य) देवता हैं,  इस मंत्रका प्रयोग उपनयन अर्थात उर्ध्वगतिवाले प्राणायाम में होता है।

ॐ आपो ज्योतिरिति शिरसः प्रजापतिर्ऋषिर्यजुश्छन्दो ब्रह्माग्निवायुसूर्या देवताः प्राणायामे विनियोगः।

विनियोग का अर्थ – ॐ आपो ज्योतिरिति... शिरोभाग के प्रजापति ऋषि हैं, प्रजापति ऋषि हैं, त्रिपदा गायत्र छंद है, ब्रह्मा, अग्नि, वायु और सूर्य दैवता हैं, इस मंत्र का प्रयोग यजुः प्राणायाम में होता है।

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्।

ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्।

मंत्र का अर्थ – जिस परमात्मा ने भूर्भुवः स्वः महः जनः तपः तथा सत्यम् इन सातों लोकों की रचना कर इन्हें व्याप्त किया है, उन्हीं सूर्य के भी देवता परमात्मा के उस परम श्रेष्ठ तेज का हम ध्यान करें जो परमात्मा हमारी बुद्धियों को असत् कर्मों के लिए प्रेरित करने में समर्थ है।  उन्हीं को असत् कर्मों से हटाकर सत्कर्मों के लिए प्रेरित करने में समर्थ है।  उन्ही परमात्मा की शक्ति जल, ज्योति, रस, अमृत, वेद, भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक  में व्याप्त हैं, वे परमात्मा हमारे रक्षक हैं।

संकल्प

हाथ मे कुश और जल लेकर निम्नलिखित संकल्प पढ़कर जल गिराएँ।

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे बौद्धावतारे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे .......... क्षेत्रे/नगरे/ग्रामें (स्थाने) ..........नामसंवत्सरे ..........ऋतौ ..........मासे (शुक्ल/कृष्ण) पक्षे ..........तिथौ ..........वासरे ..........काले .......... गोत्रः, .......... शर्मा (वर्मा, गुप्तः) अहं नित्यकर्मानुष्ठान सिद्धिद्वारा श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं च नित्यहोम करिष्ये।

मंत्र का अर्थ – ॐकार स्वरुप भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए आज ब्रह्माजा के दूसरे परार्ध में श्री श्वेतवाराह नाम कल्प में वैवस्वत मन्वन्तर में 28वें कलियुग में कलियुग के पहले चरण में पृथ्विलोक में भूः लोक में भरत खण्ड में भारत देश में ..... क्षेत्र/नगर/ग्राम (स्थान)में ..... नामक संवत्सर में ..... ऋतु में ..... महिने में ..... शुक्ल/कृष्ण पक्ष में ..... तिथि में ..... वार में ..... (प्रातः/सायं) समय .... गोत्र का .... नाम वाला मैं, नित्य कर्म को करते हुए, वेदों-पुराणों-शास्त्रों मे वर्णित फल की प्राप्ति के लिए तथा श्रीपरमेश्वर के प्रीत्यर्थ, नित्य हवन विधि को करुँगा।

पञ्च-भूसंस्कार

हवन कुण्ड पर निम्नलिखित पाँच संस्कर करने चाहिए।

1. दर्भैः परिसमुह्य।

तीन कुशोंसे हवन कुण्ड का दक्षिणसे उत्तर की ओर परिमार्जन करें तथा उन कुशों को ईशान कोण (पूर्वोत्तर कोने) में फेंक दें।

2. गोमयोदकेनोपलिप्य।

गोबर और जल से लीप दें। अथवा शुद्ध जल हवन कुण्ड पर छिड़कें।

3. वज्रेणोल्लिख्य।

कुण्ड के मध्य में स्त्रुवा अथवा कुशमूल से पश्चिम से पूर्व की ओर दस अंगुल लम्बी रेखाएँ खींचे। रेखाओं के खीचने का क्रम दक्षिण से उत्तर की ओर होता है।

4. अनामिकाङ्गुष्ठाभ्यां मृदमुद्धृत्य।

खींचने के क्रम से ही दक्षिण (दाहिने हाथ के) अनामिका और अँगूठे से रेखाओं से मिट्टी निकालकर बायें हाथ में तीन बीर रखकर पुनः सब मिट्टी दाहिने हाथ में रखलें और उसे उत्तरकी ओर फेंक दें।

5. उदकेनाभ्युक्ष्य।

पुनः जल को कुण्ड में छिड़क कर पवित्र करें।

 

नारद पुराण के द्वितीयपाद के पूर्वभाग में ऊपर प्रयोग किए गए शब्दों को विस्तार से समझाया गया है।  परिसमूहन के लिये परिगणित शाखावाले कुश कहे गये हैं, न्यून या अधिक संख्यामें उन्हें ग्रहण करने पर वे अभीष्ट कर्मको निष्फल कर देते हैं।  पृथ्वीपर जो कृमि, कीट और पतंग आदि भ्रमण करते हैं, उनकी रक्षाके लिये परिसमूहन कहा गया है।

वेदीपर जो ती रेखाएँ कही गयी हैं, उनको बराबर बनाना चाहिए;  उन्हें न्यूनाधिक नहीं करना चाहिए; ऐसा ही शास्त्रका कथन है।  जो पतङ्ग आदि भयंकर जीव सदा आकाशमें उड़ते रहते हैं, उनपर प्रहार करनेके लिये वेदी से मिट्टी उठाने का विधान है।  स्रुवाके मूलभागसे अथवा कुशसे वेदी पर रखा करनी चाहिये।  इसका उद्देश्य है अस्थि, कण्टक, तुष-केशादिसे शुद्धी।

यह पृथ्वी मधु और कैटभ नामवाले दैत्योंके मेदेसे व्याप्त है,  इसलिये इसे गोबरसे लीपना चाहिए।  जो गाय वन्ध्या, दुष्टा, दीनाङ्गी और मृतवत्सा (जिसके बछड़े मर जाते हों, ऐसी) हो, उसका गोबर यज्ञके कार्यमें नहीं लाना चाहिये, ऐसी शास्त्र आज्ञा है। 

सब देवता और पितर जलस्वरुप हैं,  अतः विधिज्ञ ऋषि-मुनियोंने जलसे वेदी का प्रोक्षण करने की आज्ञा दी है।

अग्निस्थापन

सौभाग्यवती स्त्रियोंके द्वारा ही अग्नि लानेका विधान है।  शुभदायक मृण्मय पात्रको जल से धोकर उसमें अग्नि रखकर लानी चाहिये।

अपने दक्षिण  में एक पवित्र कांस्य/तांबे/मिट्टि के पात्र में गाय के गोबर के सूखे कण्डों को कर्पूर की सहायता से जलाएँ।  अब इस पात्र को कुण्ड के अग्नि कोण में रखें।  इस अग्निमें से क्रव्यादांश (थोड़ा अंश) निकालकर हवन कुण्ड के नैर्ऋत्यकोण (दक्षिण-पश्चिम कोण) में रख।

निम्नलिखित मंत्र पढ़कर आगे रखी अग्नि को कुण्ड में स्थापित करें।

ॐ अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे। देवाँऽआ सादयादिह।

अग्नि के खाली पात्र में अक्षत के साथ जल छिड़कें।  अग्नि की सुरक्षा के लिए कुछ ईंधन डालें।  अग्नि के फूंकना पड़े तो मुख और अग्नि के बीचमें बाँसकी नली/तृण/काष्ठ का व्यवधान अवश्य लें।

मंत्र का अर्थ – हवि धारण करने वाले तथा देवदूत अग्नि को हम प्रतिष्ठित करते हैं।  उससे यह याचना करते हैं कि हे अग्ने! तू हमारे इस यज्ञ में देवताओं को प्रतिष्ठित कर।

कुशों से परिस्तरण

हवन कुण्ड में अग्नि स्थापित करने के बाद कुशों से परिस्तरण करें।

कुण्ड के पूर्व में उत्तराग्र तीन कुश/दूर्वा रखें। फिर कुण्ड के दक्षिण में पूर्वाग्र तीन कुश/दूर्वा रखें। कुण्ड के पश्चिम में उत्तराग्र तीन कुश/दूर्वा रखें। कुण्ड के उत्तर में पूर्वाग्र तीन कुश/दूर्वा रखें।

अग्नि को हवा दे कर ढ़ंग से प्रज्वलित करें।  इसके बाद अग्नि का ध्यान करें।

ॐ चत्वारि श्रृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।  त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँऽआ विवेश।

 

ॐ मुखं यः सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक् तथा।

पितॄणां च नमस्तस्मै विष्णवे पावकात्मने।।

 

हाथ जोड़कर प्रार्थना करें।

ॐ अग्ने शाण्डिल्यगोत्र मेषध्वज प्राङ्मुख मम सम्मुखो भव।

पञ्चोपचार

ॐ पावकाग्नये नमः, गंधं समर्पयामि।                  

ॐ पावकाग्नये नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।

ॐ पावकाग्नये नमः, धूपमाध्रापयामि।      

ॐ पावकाग्नये नमः, दीपं दर्शयामि।                    

ॐ पावकाग्नये नमः, नैवेद्यं निवेदयामि।

 

आहुति

पञ्चोपचार के बाद स्त्रुवा की सहायता से घी से तीन आहुति दें।

ॐ भूः स्वाहा, इदमग्नये न मम।

ॐ भुवः स्वाहा, इदम् वायवे न मम।

ॐ स्वः स्वाहा, इदम् सूर्याय न मम।

निम्नलिखित घी मिश्रृत हवन सामग्री से अँगुलियों से पाँच आहुति दें।

ॐ अग्नये स्वाहा, इदमग्नये न मम।

ॐ धन्वन्तरये स्वाहा, इदम् धन्वन्तरये न मम।

ॐ विश्वभ्यो देवेभ्यः स्वाहा, इदम् विश्वेभ्यो देवेभ्यो न मम।

ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदम् प्रजापतये न मम।

ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदमग्नये स्विष्टकृते न मम।

वराहुति

ॐ गणानां त्वा गणपति ्̐ हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति ्̐ हवामहे निधीनां त्वा निधिपति ्̐ हवामहे वसो मम।  आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्।।स्वाहा।।

 

ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन।

ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्।।स्वाहा।।

 

निम्नलिखित छः आहुति दें।

ॐ देवकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा, इदमग्नये न मम।

ॐ मनुष्यकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा, इदमग्नये न मम।

ॐ पितृकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा, इदमग्नये न मम।

ॐ आत्मकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा, इदमग्नये न मम।

ॐ एनस एनसोऽवयजनमसि स्वाहा, इदमग्नये न मम।

ॐ यच्चाहमेनो विद्वांश्चकार यच्चाविद्वाँस्तस्य सर्वस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा, इदमग्नये न मम।

 

(बचे हुए हवि को पृथ्वी और मेघ के उद्देश्य से उदकपात्र में धाता और विधाता के उद्देश्य से द्वारके दोनो ओर तथा ब्रह्मा के उद्देश्य से घर के मध्य में छोड़ दें।  दहकपात्र वह जल भरा पात्र है जो अग्नि होत्र कररते समय समीप में रख लिया जाता है और जिसमें ‘दं न मम’ कह कर आहुति का शेष भाग छोड़ा जाता है। संदर्भ – विष्णु पुराण ३-अंश ११-अध्याय ४४-श्लोक)

 

ॐ गणपतये स्वाहा।  इदम् गणपतये।

ॐ विष्णवे स्वाहा।  इदम् विष्णवे।

ॐ शंभवे स्वाहा।  इदम् शंभवे।

ॐ लक्ष्म्यै स्वाहा।  इदम् लक्ष्म्यै।

ॐ सरस्वत्यै स्वाहा।  इदम् सरस्वतयै।

ॐ भूम्यै स्वाहा। इदम् भूम्यै।

ॐ सूर्याय स्वाहा। इदम् सूर्याय।

ॐ चन्द्रमसे स्वाहा। इदम् चन्द्रमसे।

ॐ भौमाय स्वाहा।  इदम् भौमाय।

ॐ बुधाय स्वाहा। इदम् बुधाय।

ॐ बृहस्पतये स्वाहा। इदम् बृहस्पतये।

ॐ शुक्राय स्वाहा। इदम् शुक्राय।

ॐ शनैश्चराय स्वाहा। इदम् शनैश्चराय।

ॐ राहवे स्वाहा। इदम् राहवे।

ॐ केतवे स्वाहा। इदम् केतवे।

ॐ ब्युष्टयै स्वाहा। इदम् ब्युष्टयै।

ॐ उग्राय स्वाहा। इदम् उग्राय।

ॐ शतक्रतवे स्वाहा।  इदम् शतक्रतवे।

 

ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदम् प्रजापतये। इति मनसा प्रजापत्यम्।

ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदमग्नये स्विष्टकृते।

 

ॐ अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा।           

ॐ सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्य्यः स्वाहा।       

ॐ अग्निर्वर्च्चो ज्योतिर्वर्च्चः स्वाहा।          

ॐ सूर्यो वर्च्चो ज्योतिर्वर्च्चः स्वाहा।         

ॐ ज्योतिः सूर्य्यः सूर्य्यो ज्योतिः स्वाहा।

मंत्र का अर्थ – तेज अग्नि और अग्नि तेज है तथा हम उस तेजस्वी अग्नि मे हवि प्रदान करते हैं।  ज्योति सूर्य है और सूर्य ज्योति है तथा हम उस सूर्य रुपी अग्नि में आहुति देते हैं।  जो अग्नि ब्रह्म तेज से संपन्न है, उसकी ज्योति ही ब्रह्म तेज वाली है। उस अग्नि में हम हवन करते हैं।  ज्योति ही सूर्य है और सूर्य ब्रह्मज्योति है।  उसको हम आहुति समर्पित करते हैं। (यजुर्वेद तृतीयोध्यायः श्लोक 9)

ॐ सजूर्देवेन सवित्रा सजू रात्र्येन्द्रवत्या। जुषाणोऽअग्निर्वेतु स्वाहा।

ॐ सजूर्देवेन सवित्रा सजूरुषसेन्द्रवत्या। जुषाणाः सूर्य्यो वेतु स्वाहा।

मंत्र का अर्थ – सवितादेव और इन्द्रयुक्त रात्रि के साथ रहने वाला अग्नि इस आहुति को ग्रहण करे।  सवितादेव के संग इन्द्रयुक्त उषा से जुड़े हुए सूर्य को यह आहुति समर्पित है। (यजुर्वेद तृतीयोध्यायः श्लोक 10)

ॐ प्राणाय स्वाहा।        

ॐ अपानाय स्वाहा।      

ॐ व्यानाय स्वाहा।        

ॐ चक्षुषे स्वाहा।

ॐ श्रोत्राय स्वाहा।        

ॐ वाचे स्वाहा।

ॐ मनसे स्वाहा।

मंत्र का अर्थ – सूर्य

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्। 

इदम् गायत्रियै न मम।

मंत्र का अर्थ – सूर्य

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे, सुगंधिम् पुष्टिवर्धनं।  उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् स्वाहा।  इदम् महामृत्युञ्जयाय न मम।

मंत्र का अर्थ – दिव्य गंध से युक्त, दोनों लोकों का फल देनेवाले, धन्य-धान्यादि से सदैव पुष्टि प्रदान करनेवाले, त्रिनेत्रधारी रुद्र का मैं यजन करता हूँ। वे अकाल मृत्यु जैसे महान कष्टों से मेरी रक्षा करें।  जैसे पक हुआ फल (खरबूजा) सहजरुप से टूट कर पृथ्वी पर गिर पड़ता है, उसी तरह हम जन्म-मरण के पाश से मुक्त हों, लेकिन अमरता से नहीं।

त्र्यायुष्करणम्

ॐ त्र्यायुषं जगदग्नेः इति ललाटे।

कश्यपस्य त्र्यायुषं, इति ग्रीवायाम्।          

यद्देवेषु त्र्यायुष्मिति दक्षिणबाहु मूले।        

तन्नोस अस्तु त्र्यायुष्मिति हृदि।

भाव – जमदग्नि और कश्यप ऋषियों जैसी तीनों (बाल, युवा, वृद्ध) अवस्थाएं हैं तथा देवताओं की अवस्था जैसे चरित्र हैं। ऐसी तीनों अवस्थाएं मुझ याचक को भी प्राप्त हों। इसके लिए ललाट पर, गले पर, दाहिने कंधे पर एवं हृदय पर शुद्ध भस्म धारण करता हूँ। (यजुर्वेद तृतीयोध्यायः श्लोक 62)

उत्तर-पूजन

ॐ सप्त ते अग्ने समिधः सप्त जिह्वः सप्त ऋषयः सप्त धाम प्रियाणि।  सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनिरा पृणस्व घृतेन स्वाहा।।

विसर्जन

ॐ गच्छ त्वम् भगवन्नग्ने स्वस्थाने कुण्डमध्यतः।

हुत्मादाय देवेभ्यः शीघ्रं देहि प्रसीद में।।

 

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर।

यत्र ब्रह्मादयो देवाः तत्र गच्छ हुताशन।।

 

यान्तुदेवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्।

इष्टकाम समृद्धर्थ पुनरागमनाय च।

 

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।

तानि  सर्वाणि   नश्यन्तु   प्रदक्षिणपदे  पदे।।

 

मंत्र का अर्थ – हे प्रभो! मनुष्य से जाने-अनजाने में जो पाप हो जाते हैं, वे आपका परिक्रमा करते समय पद-पद पर नष्ट हो जाते हैं, हे देव मेरी रक्षा करें।

अनेन नित्यहोम कर्मणा श्रीपरमेश्वरः प्रियतां न मम।

ॐ तत्सत् श्रीब्रह्मार्पणमस्तु।

 

यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या   तपोयज्ञक्रियादिषु।

न्यूनं सम्पूर्णतां याति     सद्यो वन्दे तमच्युतम्।।

 

श्रीविष्णवे नमः, श्रीविष्णवे नमः, श्रीविष्णवे नमः।।

श्रीविष्णुस्मरणात् परिपूर्णतास्तु।

सृष्टि के सात स्तर

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