Monday, 28 September 2020

फलित ज्योतिष नियामक न हो कर संकेतात्मक मात्र है

 


फलित ज्योतिष नियामक न हो कर संकेतात्मक मात्र है

 

Article By – Shashi Kant Mishra

 

फलित ज्योतिष के प्रयोग के दौरान सब से दर किनार किया जाने वाला सिद्धान्त है – “फलित ज्योतिष नियामक न हो कर संकेतात्मक मात्र है”।  ग्रह गोचर केवल सूचक होते हैं।  यह संकेत भी जातक के जीवन में कुछ घटित होने की संभावना ही बतला सकते हैं।  घटना घटेगी ही, यह तो सिर्फ काल ही बतलाने में सक्षम है।

सदैव स्मण रखना चाहिए कि ग्रह, नक्षत्र कभी भी सुख-दुख नहीं देते हैं।  यह मात्र सुख-दुख की सूचना दे सकते हैं। 

कई ज्योतिष-प्रयोगकर्ता ग्रहों के प्रभाव में वैज्ञानिकता को जोड़ने का प्रयत्न करते हैं।  यह सत्य है कि इस ब्रह्माण्ड में हर पिण्ड एक दूसरे से किसी न किसी रूप से जुड़े हैं।  उसी प्रकार हर जातक ग्रहों से किसी न किसी रूप से बंधा हुआ है।  परंतु कोई ऐसा वैज्ञानिक सिद्धान्त नहीं है जो यह प्रमाणित कर सके की जातक से जीवन के जुड़ी घटनाँ वैज्ञानिक तरीकों से ग्रहों के बंधी हैं और उनका प्रत्यक्ष प्रभाव जातक पर होते हैं।

वैज्ञानिक विचार नियमों में बंध जाते हैं।  ग्रहों के प्रभाव को नियम में नहीं बांधा जा सकता है।  अगर ग्रहों के प्रभाव और जातक के जीवन से जुड़ी घटनाओं को नियम बद्ध  किया जाए तो पूरा विश्व चंद समूह/समुदायों में बंट जाएगा, और इन समुदायों में एक जैसी घटना विश्वभर में घटित होती रहेंगी।  परंतु, ऐसा होना असंभव है और ऐसा मानना भी मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं  है।  अतः कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ज्योतिष और होरा में सामंजस्य नहीं बिठाया जा सकता है। इसलिए जातक के साथ ग्रहों के बंधन को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ही तर्कसंगत समझना चाहिए।  ग्रहों की स्थिति का सामन्जस्य जातक के कर्मों से जोड़ कर ही घटनाओं का अनुमान लगाना चाहिए।

कर्म फल के सिद्धान्तों पर इस उक्ति को परखा जाए तब भी यह सिद्ध होता है कि ग्रह स्वयं फल देने में सक्ष्म नहीं हो सकते है।  मनुष्य अपने ही द्वारा किए गए कर्मों के फलों को भोगता है।  ईश्वर द्वारा प्रदत्त इच्छा शक्ति से ही अपने संस्कारों का निर्माण करता है और संस्कारों के अनुरूप ही फलों में परिवर्तन कर सकता है।  यह जातक के संस्कार ही है जो उसके संकल्प शक्ति का निर्माण करता है और उसी अनुरूप जातक का कारण शरीर विकसित होता है और जातक को फल प्राप्त होते हैं।  ऐसा स्थिति में यह तर्क संगत नहीं हो सकता है कि ग्रह किसी जातक को सुख या दुख दे रहे हैं।  अगर ग्रहों द्वारा जातक को फल देना माना जाए तो जातक के “कर्मों के प्रतिफल और जातक की इच्छा शक्ति” जैसे सिद्धान्त तर्कसंगत नहीं रह सकेंगे।

 

निष्कर्ष – ज्योतिष का जातक स्कंध संकेतात्मक विद्या है।  ग्रह स्वयं सुख-दुख देने में सक्षम नहीं है।  यह शास्त्र आध्यात्मिक ज्ञान कोश है।  इस दिव्य ज्ञान को भौतिक विज्ञान की श्रेणी में रख कर हम इस ज्ञान का गलत आंकलन करते हैं।

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अहिंसकस्य दान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च।

सर्वदा नियमस्थस्य सदा सानुग्रहा ग्रहाः।।

यह श्लोक फलिदीपका में अध्याय २६ से है।  दक्षिण भारत के नम्बूदरी ब्राह्मण श्री मंत्रेश्वर जी जातक ग्रंथ के इस श्लोक द्वारा स्पष्ट करते हैं कि – जो व्यक्ति किसी की हिंसा नहीं चाहता, संयमी होता है तथा धर्म मार्ग से धनोपार्जन करता है और सर्वदा शास्त्रोपदिष्ट नियमों का पालन करता है उस पर ग्रह सदैव अनुग्रह करते हैं। अर्थात ग्रह उसके अनुकूल प्रतीत होते हैं।

 

महाभारत खण्ड-2 पृष्ठ 1608

 

अप्रकीर्णेन्द्रियं दान्तं शुचिं नित्यमतनद्रितम्।

आस्तिकं श्रद्दधानं च वर्जयन्ति सदा ग्रहाः।।58।।

जिसने अपनी इन्द्रियों को सब ओर से समेट लिया है, जो जितेन्द्रिय, पवित्र, नित्य आलस्यरहित, आस्तिक तथा श्रद्धालु है, उस पुरुष को ग्रह कभी नहीं छेड़ते हैं।

 

इत्येष ते ग्रहोद्देशो मनुषाणां प्रकीर्तितः।

न स्पृशन्ति ग्रहा भक्तान् नरान् देवं महेश्वरम्।।59।।

राजन! इस प्रकार मैने मनुष्यों को जो ग्रहों की बाधा प्राप्त होती है, उसका संक्षेप से वर्णन किया है।  जो भगवान् महेश्वर के भक्त हैं, उन मनुष्योंको भी ये ग्रह नहीं छूते हैं।

कल आज और कल का ज्योतिष


 कल आज और कल का ज्योतिष

 

जैसा हम आज देखते हैं पूर्व काल में उससे भिन्न सामजिक व्यवस्था थी।  ज्योतिष विद्या सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप परिवर्तित होती रही है।  और समाज के दर्शन के अनुरूप ज्यतिर्विदों के कार्यक्षेत्र में भी परिवर्तन आते रहे हैं।  मैं पुनः अपने निजि विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ।  भूल चूक के लिए क्षमा चाहूँगा।

 

1. नाम और यश का ज्योतिष

 

पूर्व काल - श्रुतियों में ज्योतिष संबंधित सूक्तों के रचयिता का हमें पता नहीं।  सूर्यसिद्धान्त के प्रणेता ने अपने नाम और यश से अधिक महत्व ज्ञान को दिया।  आगे चल कर पाराशर मुनी, जैमिनी, नारद आदि आचार्यों नें ज्योतिष सिद्धन्तों को समय तथा देशाचार के अनुसार प्रतिपादित किया।

 

वर्तमान काल   आज के समाज में नाम और यश की दौड़ में अनकों स्वयंभू विद्वान ज्योतिषी शामिल हैं।  ज्योतिषाचार्यों की भीड़ में धूर्ताचार्य और मूर्खाचार्यों की भरमार है।  हमने सुना था

न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी ।

व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥   

अर्थात विद्यारुपी धन को कोई चुरा नही सकता, राजा ले नही सकता, भाईयों में उसका भाग नही होता, उसका भार नही लगता, (और) खर्च करने से बढता है ।  सचमुच, विद्यारुप धन सर्वश्रेष्ठ है ।

 

परंतु आजके स्वयंभू ज्योतिषाचार्य निःसंकोच अपने गुरुजनों का तिरस्कार कर रहे हैं। दूसरों के ज्ञान व अनुभव को निर्लज्जता से चुराने में माहिर हो गए हैं।  अपने नाम का डंका बजाने में लगे हैं।

 

भविष्य काल – आज के धूर्ताचार्य और मूर्खाचार्य असत्य के मार्ग पर चल रहे हैं।  कहीं न कहीं तो उन्हे गिरना ही पड़ेगा।  इनकी वजह से ज्योतिष पर से समाज का विश्वास उठ जाएगा।  तब ज्योतिष कुछ गिने चुने विद्वानों के द्वारा ही जीवित रहेगा।  निश्चय ही काल चक्र में ज्योतिष के पतन के बाद पुनर्जीवित होगा।

 

2. अध्यात्म और ज्योतिष

पूर्व काल - ज्योतिर्विद / कालगणक / दैवज्ञ आदि के गुणों को भी परिभाषित किया जाता था।  वेदों के अध्ययन के उपरान्त ही नित्य, नैमित्तिक कर्म काण्ड संबंधित कार्यों के लिए काल गणना ज्योतिष द्वारी किया जाता था।  ज्योतिर्विद भौतिक फलों के साथ साथ अध्यात्मिक लक्ष की ओर प्रोत्साहित करता था।

वर्तमान काल – आज तो ज्यादातर जातक अपनी समस्याओं के लिए ज्योतिषियों के चक्कर लगाते लगाते स्वयं ज्योतिषी बन जाते हैं और दूसरों का उपचार करने लगते हैं।  अध्यात्म, दर्शन, शास्त्रों के अध्ययन के बिना ज्योतिष कार्य आरंभ कर देते हैं।  एक दिव्य ज्ञान को विज्ञान(भौतिक, रसायन आदि जैसा) कह कर उपहास का पात्र बना देते हैं।

भविष्य काल – भौतिक सुख से ऊब कर लोग पुनः अध्यात्म पर लौटेंगे।  ऐसे में एक ज्योतिर्विद को भी ज्योतिष को दिव्य ज्ञान, या पराविज्ञान या meta science के रूप में अध्ययन करना पड़ेगा।  कर्म के सिद्धान्तों के अध्ययन को समयानुसार समझते हुए दैवज्ञ विद्या को प्रयोग में लाना पड़ेगा।

 

3. ज्योतिष और अन्य विद्या के क्षेत्र

पूर्वकाल -  ज्योतिष को त्रिस्कंधात्मक कहते हैं।  अतः एक दैवज्ञ सिद्धान्त, होरा और संहिता तीनों में सिद्ध होता था। आयुर्वेद में ज्योतिष और ज्योतिष उपचार में आयुर्वेद सामान्य था।  कृषि, व्यापार, युद्ध में ज्योतिष का प्रयोग समान्य था। धार्मिक कृत्यों में ज्योतिर्विद के आदेश सर्वमान्य रहते थे।  ज्योतिर्विद को आकाश, नक्षत्र, तारों की पूरी जानकारी रहती थी। 

वर्तमान काल – ज्योतिष का प्रयोग आज व्यवसाय में, सट्टे बाजार में खूब प्रचलित है।  आधुनिक युग के कुछ बहु प्रचलित ज्योतिष-सिद्धान्त तो मूल रूप से घुड़सवारी के सट्टे बाजार से निकल कर पाराशरी सिद्धान्तों को चुनौती देने लगे हैं।  आज अधिकतर ज्योतिषी आकाश का प्रत्यक्ष रूप अध्ययन की आवश्यकता ही नहीं समझते हैं।  अनेको का तो खगोल तथा गणित से कुछ लेना देना ही नहीं है।  परंतु उन्ही पिण्डों से संबंधित फलित करते रहते हैं।   चिकित्सा, मौसमविज्ञान आदि के क्षेत्रों में विकास के बाद ज्योतिष का प्रयोग इन क्षेत्रों में घट गया है।

भविष्य काल -  खगोल शास्त्री और भौतिक वैज्ञानिक सृष्टि की रचना को समझते हुए अणु के गॉड पार्टिक को समझते हुए परा विज्ञान के महत्व को समझेंगे।  कर्म के सिद्धान्त तथा पुनर्जन्म में विश्वास करने लगेंगे तथा ज्योतिष के महत्व को समझेंगे। 

    

4. ज्योतिषी और उनकी उपाधियाँ

पूर्व काल – समाज में विद्वानों को विशेष परिश्रम के उपरांत ही किसी स्तर की उपाधी मिलती थी।  उदाहण के लिए ब्राह्मणों के आठ भेद थे।  वरीयता क्रम से वे इस प्रकार हैं - 1. मात्र  2. ब्राह्मण 3. श्रोत्रिय 4. अनूचान 5. भ्रूण 6. ऋषिकल्प           7. ऋषि 8. मुनि।  इन श्रेणियों पर पहुँचना आसान नहीं था।

वर्तमान काल – कुछ विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शास्त्री, आचार्य, भूषण, या मार्तण्ड आदि की उपाधी प्रदान की जाती हैं।  यह उपाधियाँ अनुभव के आभाव में अक्सर अर्थहीन हो जाती हैं।  परंतु इसके अलावा आजकल तो किसी भी ज्योतिष सम्मेलन में शुल्क दीजिए और मन चाही उपाधी मांग लीजिए।  आपको ज्योतिष आता हो या न आता हो कौन देखता है।  कुछ वर्ष पूर्व जब मैं किसी ज्योतिषी से मिलने जाता था तो उनके घरों दफ्तरों में रखे अनगिनत मैडल, मेमैन्टो, सर्टिफिकेट देख कर सकपका जाता था। 

भविष्य काल – ऐसा गोरख धंधा अधिक दिनो तक नहीं चलता है।  सरकार भी इस पर लगाम लगाने का प्रयास कर रही है।  और अधिकृत विद्वान ही ज्योतिष का कार्य कर सकेंगे।  मनचाही डिग्रीयों का मजाक ही उड़ेगा। 

5. ज्योतिषी और भविष्यवक्ता

पूर्वकाल – अपने ज्ञान और तप के बल से ज्योतिर्विद एक भविष्यवक्ता से ऊँचे स्थान पर था।  वह मार्गदर्शक था।

वर्तमान काल – आज प्रायः ज्योतिषी कुण्डली तक ही सीमित रह गया है।  उसमें भी केवल पूर्व घटित घटनाओं को खोजता है, अनुमान लगाता है और जातक को उलझाता है।  भविष्य कथन तो बहुत कम ही कर पाते हैं। 

भविष्य काल – आधुनिक विज्ञान के साथ ज्योतिष के प्रयोग में उन्नति होगी। 

6. कम्प्यूटर और ज्योतिषी

कंप्यूटर ने ज्योतिषियों का कार्य को बहुत आसान कर दिया है।   कंप्यूटर से कोई भी कुण्डली चन्द पलों में बन कर सामने आ जाती है।  षड्बल, पिण्डायु आदि निर्णय, अष्टकवर्ग पिण्डादि, विभिन्न प्रकार के ज्योतिष चक्र, सूक्ष्म दशा इत्यादि को बिना परिश्रम के निकाला जा सकता है।  वास्तव में कम्प्यूटर नें एक ज्योतिषविद्वान की कार्य क्षमता को बहुत तीव्र कर दिया है।  कम्प्यूटर से निर्मित कुण्डलियों में गलतियाँ कम हो गई हैं।  वास्तव में देखा जाए तो मुझे पुराने समय की हस्तलिखित एक भी कुण्डली सही नहीं मिली है।  लगभग सब में गणना की गलतियाँ सामान्य रूप से देखी गई हैं।

परंतु कम समय में सब कुछ का सामने आने से ज्योतिषी के विचारों का पतन हो जाता है।  इसकी वजह से बिना चिंतन के वह फलित करने को प्रेरित हो जाता है।  इससे ज्योतिषी ज्ञान से दूर होते जा रहा है।

 

आज का ज्योतिषी अगर अध्यात्म, दर्शन, ज्ञान, साधना आदि के साथ कम्प्यूटर से अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाता है तो कंप्यूटर उसका सेवक होगा अन्यथा वह ज्योतिषी कंप्यूटर का गुलाम हो जाएगा।  गुलामी से बुद्धि भ्रष्ट होगी और वह भ्रष्टाचार्य, धूर्ताचार्य, मूर्खाचार्य की श्रेणी में अपने आप को स्थापित कर लेगा।

Friday, 7 August 2020

नक्षत्रों के आधुनिक नामकरण पर संशय

 नक्षत्रों के आधुनिक नामकरण पर संशय


जब भी भारतीय ज्योतिष शास्त्र से बाहर जा कर नक्षत्रों के विषय में खोजता हूँ तो ऐसा लगता है की अन्य दुनिया में चला गया हूँ।  एक ऐसी दुनिया जो भारत को जानती ही नहीं थी।  फिर जब भारतीय विद्वान ज्योतिषियों से चर्चा करता हूँ ऐसा लगता है मैं आधुनिक सभ्यता से दूर हूँ।  क्यों कि जब मैं रोहिणी नक्षत्र की चर्चा करता हूँ तो विद्वान ज्योतिषी Aldebran के बारे में बताते हैं; जब मैं आर्द्रा कहता हूँ तो वे Betelgeuse कहते हैं।   


वास्तव में ऐसे विद्वान ज्योतिषी  International Astronomical Union के नामकरण के प्रति निष्ठावान देखे जाते हैं।  IAU एक अंतर्राष्ट्रीय खगोल की संस्था है।  यह संघ 1909 में स्थापित हुआ था।  भारत की सदस्यता इसमें 1965 से हुई थी।  IAU ने आरंभ से ही भारतीय खगोल ज्ञान को नजरअंदार करके यूरोपीय व अरबी खगोल को महत्व दिया।  इसी के प्रभाव में आकर सभी ग्रहों व नक्षत्रों का नामकरण किया गया।  मात्र 1200ई की पुस्तकों के आधार पर नामकरण किए गए हैं।  वहीं चार हजार सालों या उससे भी अधिक सालों से प्रयोग किए जाने वाले वैदिक नामों का तिरस्कार किया गया।

  

यह तो विदेशियों की बात है, आश्चर्य होता है जब निष्ठावार भारतीय ज्योतिषी भी IAU का अनुसरण करते हुए विदेशी नामों से ही नक्षत्रों को पहचानने में गर्व महसूस करते है।  इस प्रकार से विद्वान अपने ज्ञानी होने का प्रमाण देते हैं।  भारतीय नक्षत्रों को कम से कम चार हजार सालों से जिन नाम से पुकारते रहे आज उन्हीं को विदेशी नाम से पुकारने का क्या मतलब है।  


भारतीय ज्योतिष विद्वानों को अपनी सभ्यता का गौरव बनाए रखना चाहिए।  स्वदेशीय नामों से ही नक्षत्रों को पहचानने में गौरव महसूस करना चाहिए तथा प्रचारित करना चाहिए।


आप क्या पसंद करते हैं रोहिणी या Aldebran; अश्विनी या Sheratan; चित्रा या Spica; पुनर्वसु या Pollux?


जरूर बताएँ।  तथा अन्य ज्योतिष मित्रों को भी इस विदेशी नामकरण से जागरूक करें।


धन्यवाद।

शशिकान्त मिश्र

Tuesday, 28 July 2020

विभिन्न कालों में सप्तऋषि का स्वरूप


विभिन्न कालों में सप्तऋषि का स्वरूप

 

उत्तर के आकाश में सप्तऋषी मण्डल सब से आसानी से पहचाना जा सकता है।  इस तारा समूह के सात ऋषि हैं - क्रतु, पुलह, पुलत्स्य, अक्षि अंगिरस, वशिष्ठ, मरीचि।   नावियों और यात्रियों के लिए यह दिशासूचक आकाशीय देन है।  सप्तऋषि मण्डल के विभिन्न नाम है। आज भी ग्रामीण लोग इसे खटोला या हल कहते हैं।   उत्तरी एशिया में यह भालू के रूप में पहचाना जाता है।  यूरोप में इसे बिग डिपर/Ursa Major कहते हैं।  

 

फलित ज्योतिष से बाहर जाकर कल्पना करते हैं।   5000 हजार साल के अंतरालों में सप्तऋषि के स्वरूप आगे दिए चित्रों के जैसे होते हैं।

 
10000 साल पहले सप्तऋषि ऐसे दिखते होंगे ।

 
 
 
5000 साल पहले सप्तऋषि ऐसे दिखते होंगे। 


आज सप्तऋषि कुछ ऐसे दिखते हैं।

 
 
 

5000 साल बाद सप्तऋषि कुछ ऐसे दिखेंगे 

 


Concept Imaginations and Graph by Shashi Kant Mishra.

सृष्टि के सात स्तर

  “ यह प्रकृति पुरुष और स्त्री के  मैथुन   शक्ति के अनुसार विकसित और प्रकाशित हुई है ”   प्रकृति क्या है? ब्रह्मणः सकाशान्नानाविचित्...