फलित ज्योतिष नियामक न हो कर संकेतात्मक मात्र है
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By – Shashi Kant Mishra
फलित ज्योतिष के
प्रयोग के दौरान सब से दर किनार किया जाने वाला सिद्धान्त है – “फलित ज्योतिष नियामक
न हो कर संकेतात्मक मात्र है”। ग्रह
गोचर केवल सूचक होते हैं। यह संकेत भी
जातक के जीवन में कुछ घटित होने की संभावना ही बतला सकते हैं। घटना घटेगी ही, यह तो
सिर्फ काल ही बतलाने में सक्षम है।
सदैव स्मण रखना
चाहिए कि ग्रह, नक्षत्र कभी भी सुख-दुख नहीं देते हैं। यह मात्र सुख-दुख की सूचना दे सकते हैं।
कई
ज्योतिष-प्रयोगकर्ता ग्रहों के प्रभाव में वैज्ञानिकता को जोड़ने का प्रयत्न करते
हैं। यह सत्य है कि इस ब्रह्माण्ड में हर
पिण्ड एक दूसरे से किसी न किसी रूप से जुड़े हैं।
उसी प्रकार हर जातक ग्रहों से किसी न किसी रूप से बंधा हुआ है। परंतु कोई ऐसा वैज्ञानिक सिद्धान्त नहीं है जो यह
प्रमाणित कर सके की जातक से जीवन के जुड़ी घटनाँ वैज्ञानिक तरीकों से ग्रहों के
बंधी हैं और उनका प्रत्यक्ष प्रभाव जातक पर होते हैं।
वैज्ञानिक विचार
नियमों में बंध जाते हैं। ग्रहों के
प्रभाव को नियम में नहीं बांधा जा सकता है।
अगर ग्रहों के प्रभाव और जातक के जीवन से जुड़ी घटनाओं को नियम बद्ध किया जाए तो पूरा विश्व चंद समूह/समुदायों में
बंट जाएगा, और इन समुदायों में एक जैसी घटना विश्वभर में घटित होती रहेंगी। परंतु, ऐसा होना असंभव है और ऐसा मानना भी मूर्खता
के सिवाय कुछ नहीं है। अतः कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ज्योतिष और होरा
में सामंजस्य नहीं बिठाया जा सकता है। इसलिए जातक के साथ ग्रहों के बंधन को
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ही तर्कसंगत समझना चाहिए। ग्रहों की स्थिति का सामन्जस्य जातक के कर्मों
से जोड़ कर ही घटनाओं का अनुमान लगाना चाहिए।
कर्म फल के
सिद्धान्तों पर इस उक्ति को परखा जाए तब भी यह सिद्ध होता है कि ग्रह स्वयं फल
देने में सक्ष्म नहीं हो सकते है। मनुष्य
अपने ही द्वारा किए गए कर्मों के फलों को भोगता है। ईश्वर द्वारा प्रदत्त इच्छा शक्ति से ही अपने
संस्कारों का निर्माण करता है और संस्कारों के अनुरूप ही फलों में परिवर्तन कर
सकता है। यह जातक के संस्कार ही है जो
उसके संकल्प शक्ति का निर्माण करता है और उसी अनुरूप जातक का कारण शरीर विकसित
होता है और जातक को फल प्राप्त होते हैं। ऐसा
स्थिति में यह तर्क संगत नहीं हो सकता है कि ग्रह किसी जातक को सुख या दुख दे रहे
हैं। अगर ग्रहों द्वारा जातक को फल देना
माना जाए तो जातक के “कर्मों के प्रतिफल और जातक की इच्छा शक्ति” जैसे सिद्धान्त
तर्कसंगत नहीं रह सकेंगे।
निष्कर्ष –
ज्योतिष का जातक स्कंध संकेतात्मक विद्या है। ग्रह स्वयं सुख-दुख देने में सक्षम नहीं
है। यह शास्त्र आध्यात्मिक ज्ञान कोश
है। इस दिव्य ज्ञान को भौतिक विज्ञान की
श्रेणी में रख कर हम इस ज्ञान का गलत आंकलन करते हैं।
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अहिंसकस्य
दान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च।
सर्वदा
नियमस्थस्य सदा सानुग्रहा ग्रहाः।।
यह श्लोक फलिदीपका
में अध्याय २६ से है। दक्षिण भारत के
नम्बूदरी ब्राह्मण श्री मंत्रेश्वर जी जातक ग्रंथ के इस श्लोक द्वारा स्पष्ट करते
हैं कि – जो व्यक्ति किसी की हिंसा नहीं चाहता, संयमी होता है तथा धर्म मार्ग से
धनोपार्जन करता है और सर्वदा शास्त्रोपदिष्ट नियमों का पालन करता है उस पर ग्रह
सदैव अनुग्रह करते हैं। अर्थात ग्रह उसके अनुकूल प्रतीत होते हैं।
महाभारत खण्ड-2 पृष्ठ 1608
अप्रकीर्णेन्द्रियं
दान्तं शुचिं नित्यमतनद्रितम्।
आस्तिकं
श्रद्दधानं च वर्जयन्ति सदा ग्रहाः।।58।।
जिसने अपनी इन्द्रियों को सब ओर से समेट
लिया है, जो जितेन्द्रिय, पवित्र, नित्य आलस्यरहित, आस्तिक तथा श्रद्धालु है, उस
पुरुष को ग्रह कभी नहीं छेड़ते हैं।
इत्येष
ते ग्रहोद्देशो मनुषाणां प्रकीर्तितः।
न
स्पृशन्ति ग्रहा भक्तान् नरान् देवं महेश्वरम्।।59।।
राजन! इस प्रकार मैने मनुष्यों को जो
ग्रहों की बाधा प्राप्त होती है, उसका संक्षेप से वर्णन किया है। जो भगवान् महेश्वर के भक्त हैं, उन मनुष्योंको
भी ये ग्रह नहीं छूते हैं।
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