कल आज और कल का ज्योतिष
जैसा हम आज देखते
हैं पूर्व काल में उससे भिन्न सामजिक व्यवस्था थी। ज्योतिष विद्या सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप
परिवर्तित होती रही है। और समाज के दर्शन
के अनुरूप ज्यतिर्विदों के कार्यक्षेत्र में भी परिवर्तन आते रहे हैं। मैं पुनः अपने निजि विचार प्रस्तुत कर रहा
हूँ। भूल चूक के लिए क्षमा चाहूँगा।
1. नाम और यश का ज्योतिष
पूर्व काल -
श्रुतियों में ज्योतिष संबंधित सूक्तों के रचयिता का हमें पता नहीं। सूर्यसिद्धान्त के प्रणेता ने अपने नाम और यश
से अधिक महत्व ज्ञान को दिया। आगे चल कर पाराशर
मुनी, जैमिनी, नारद आदि आचार्यों नें ज्योतिष सिद्धन्तों को समय तथा देशाचार के
अनुसार प्रतिपादित किया।
वर्तमान काल – आज के समाज में नाम और यश की दौड़ में अनकों
स्वयंभू विद्वान ज्योतिषी शामिल हैं।
ज्योतिषाचार्यों की भीड़ में धूर्ताचार्य और मूर्खाचार्यों की भरमार
है। हमने सुना था
न चोरहार्यं न च
राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी ।
व्यये कृते वर्धते एव
नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥
अर्थात
विद्यारुपी धन को कोई चुरा नही सकता,
राजा ले नही सकता,
भाईयों में उसका भाग नही होता,
उसका भार नही लगता,
(और) खर्च करने से बढता है । सचमुच,
विद्यारुप धन सर्वश्रेष्ठ है ।
परंतु
आजके स्वयंभू ज्योतिषाचार्य निःसंकोच अपने गुरुजनों का तिरस्कार कर रहे हैं।
दूसरों के ज्ञान व अनुभव को निर्लज्जता से चुराने में माहिर हो गए हैं। अपने नाम का डंका बजाने में लगे हैं।
भविष्य काल –
आज के धूर्ताचार्य
और मूर्खाचार्य असत्य के मार्ग पर चल रहे हैं। कहीं न कहीं तो उन्हे गिरना ही पड़ेगा। इनकी वजह से ज्योतिष पर से समाज का विश्वास उठ
जाएगा। तब ज्योतिष कुछ गिने चुने
विद्वानों के द्वारा ही जीवित रहेगा।
निश्चय ही काल चक्र में ज्योतिष के पतन के बाद पुनर्जीवित होगा।
2. अध्यात्म और ज्योतिष
पूर्व काल -
ज्योतिर्विद / कालगणक / दैवज्ञ आदि के गुणों को भी परिभाषित किया जाता था। वेदों के अध्ययन के उपरान्त ही नित्य,
नैमित्तिक कर्म काण्ड संबंधित कार्यों के लिए काल गणना ज्योतिष द्वारी किया जाता
था। ज्योतिर्विद भौतिक फलों के साथ साथ
अध्यात्मिक लक्ष की ओर प्रोत्साहित करता था।
वर्तमान काल –
आज तो ज्यादातर जातक अपनी समस्याओं के लिए ज्योतिषियों के चक्कर लगाते लगाते स्वयं
ज्योतिषी बन जाते हैं और दूसरों का उपचार करने लगते हैं। अध्यात्म, दर्शन, शास्त्रों के अध्ययन के बिना
ज्योतिष कार्य आरंभ कर देते हैं। एक दिव्य
ज्ञान को विज्ञान(भौतिक, रसायन आदि जैसा) कह कर उपहास का पात्र बना देते हैं।
भविष्य काल –
भौतिक सुख से ऊब कर लोग पुनः अध्यात्म पर लौटेंगे। ऐसे में एक ज्योतिर्विद को भी ज्योतिष को दिव्य
ज्ञान, या पराविज्ञान या meta science
के रूप में अध्ययन करना पड़ेगा। कर्म के
सिद्धान्तों के अध्ययन को समयानुसार समझते हुए दैवज्ञ विद्या को प्रयोग में लाना
पड़ेगा।
3. ज्योतिष और अन्य विद्या के क्षेत्र
पूर्वकाल -
ज्योतिष को त्रिस्कंधात्मक कहते हैं।
अतः एक दैवज्ञ सिद्धान्त, होरा और संहिता तीनों में सिद्ध होता था।
आयुर्वेद में ज्योतिष और ज्योतिष उपचार में आयुर्वेद सामान्य था। कृषि, व्यापार, युद्ध में ज्योतिष का प्रयोग
समान्य था। धार्मिक कृत्यों में ज्योतिर्विद के आदेश सर्वमान्य रहते थे। ज्योतिर्विद को आकाश, नक्षत्र, तारों की पूरी
जानकारी रहती थी।
वर्तमान काल –
ज्योतिष का प्रयोग आज व्यवसाय में, सट्टे बाजार में खूब प्रचलित है। आधुनिक युग के कुछ बहु प्रचलित
ज्योतिष-सिद्धान्त तो मूल रूप से घुड़सवारी के सट्टे बाजार से निकल कर पाराशरी
सिद्धान्तों को चुनौती देने लगे हैं। आज अधिकतर
ज्योतिषी आकाश का प्रत्यक्ष रूप अध्ययन की आवश्यकता ही नहीं समझते हैं। अनेको का तो खगोल तथा गणित से कुछ लेना देना ही
नहीं है। परंतु उन्ही पिण्डों से संबंधित
फलित करते रहते हैं। चिकित्सा,
मौसमविज्ञान आदि के क्षेत्रों में विकास के बाद ज्योतिष का प्रयोग इन क्षेत्रों
में घट गया है।
भविष्य काल - खगोल शास्त्री और भौतिक वैज्ञानिक सृष्टि की
रचना को समझते हुए अणु के गॉड पार्टिक को समझते हुए परा विज्ञान के महत्व को
समझेंगे। कर्म के सिद्धान्त तथा पुनर्जन्म
में विश्वास करने लगेंगे तथा ज्योतिष के महत्व को समझेंगे।
4. ज्योतिषी और उनकी उपाधियाँ
पूर्व काल –
समाज में विद्वानों को विशेष परिश्रम के उपरांत ही किसी स्तर की उपाधी मिलती
थी। उदाहण के लिए ब्राह्मणों के आठ भेद
थे। वरीयता क्रम से वे इस प्रकार हैं - 1.
मात्र 2. ब्राह्मण 3. श्रोत्रिय 4. अनूचान
5. भ्रूण 6. ऋषिकल्प 7. ऋषि 8.
मुनि। इन श्रेणियों पर पहुँचना आसान नहीं
था।
वर्तमान काल – कुछ
विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शास्त्री, आचार्य, भूषण, या मार्तण्ड आदि की
उपाधी प्रदान की जाती हैं। यह उपाधियाँ
अनुभव के आभाव में अक्सर अर्थहीन हो जाती हैं।
परंतु इसके अलावा आजकल तो किसी भी ज्योतिष सम्मेलन में शुल्क दीजिए और मन
चाही उपाधी मांग लीजिए। आपको ज्योतिष आता
हो या न आता हो कौन देखता है। कुछ वर्ष
पूर्व जब मैं किसी ज्योतिषी से मिलने जाता था तो उनके घरों दफ्तरों में रखे अनगिनत
मैडल, मेमैन्टो, सर्टिफिकेट देख कर सकपका जाता था।
भविष्य काल – ऐसा गोरख
धंधा अधिक दिनो तक नहीं चलता है। सरकार भी
इस पर लगाम लगाने का प्रयास कर रही है। और
अधिकृत विद्वान ही ज्योतिष का कार्य कर सकेंगे।
मनचाही डिग्रीयों का मजाक ही उड़ेगा।
5. ज्योतिषी और भविष्यवक्ता
पूर्वकाल – अपने
ज्ञान और तप के बल से ज्योतिर्विद एक भविष्यवक्ता से ऊँचे
स्थान पर था। वह मार्गदर्शक था।
वर्तमान काल –
आज प्रायः ज्योतिषी कुण्डली तक ही सीमित रह गया है। उसमें भी केवल पूर्व घटित घटनाओं को खोजता है,
अनुमान लगाता है और जातक को उलझाता है।
भविष्य कथन तो बहुत कम ही कर पाते हैं।
भविष्य काल –
आधुनिक विज्ञान के साथ ज्योतिष के प्रयोग में उन्नति होगी।
6. कम्प्यूटर और ज्योतिषी
कंप्यूटर ने
ज्योतिषियों का कार्य को बहुत आसान कर दिया है।
कंप्यूटर से कोई भी कुण्डली चन्द पलों में बन कर सामने आ जाती है। षड्बल, पिण्डायु आदि निर्णय, अष्टकवर्ग
पिण्डादि, विभिन्न प्रकार के ज्योतिष चक्र, सूक्ष्म दशा इत्यादि को बिना परिश्रम
के निकाला जा सकता है। वास्तव में
कम्प्यूटर नें एक ज्योतिषविद्वान की कार्य क्षमता को बहुत तीव्र कर दिया है। कम्प्यूटर से निर्मित कुण्डलियों में गलतियाँ
कम हो गई हैं। वास्तव में देखा जाए तो
मुझे पुराने समय की हस्तलिखित एक भी कुण्डली सही नहीं मिली है। लगभग सब में गणना की गलतियाँ सामान्य रूप से
देखी गई हैं।
परंतु कम समय में सब कुछ का सामने आने से
ज्योतिषी के विचारों का पतन हो जाता है।
इसकी वजह से बिना चिंतन के वह फलित करने को प्रेरित हो जाता है। इससे ज्योतिषी ज्ञान से दूर होते जा रहा है।
आज का ज्योतिषी अगर अध्यात्म, दर्शन,
ज्ञान, साधना आदि के साथ कम्प्यूटर से अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाता है तो कंप्यूटर
उसका सेवक होगा अन्यथा वह ज्योतिषी कंप्यूटर का गुलाम हो जाएगा। गुलामी से बुद्धि भ्रष्ट होगी और वह
भ्रष्टाचार्य, धूर्ताचार्य, मूर्खाचार्य की श्रेणी में अपने आप को स्थापित कर
लेगा।
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