Thursday, 13 May 2021

रामकृष्णपरमहंस के संदेश

 

स्वामी रामकृष्णपरमहंस के संदेश



 

स्वामी रामकृष्ण मानवता के अन्य पुजारी थे।  अल्पायु में ही उन्हे तत्वज्ञान हो गया था।  उन्हों ने तत्वज्ञान को बोधक कथाओं के माध्यम से प्रसारित किया था।  उनके कुछ बहुमूल्य संदेश इस प्रकार हैं-

1.      अद्वैतवाद और ब्रह्मजिज्ञासा -  उन्हों ने सब भूतों (पंचतत्वादि) में आत्मा के दर्शन का संदेश दिया और सब कुछ एक  ईश्वर का स्वरूप माना।  उस अद्भुत ईश्वर और ब्रह्म की खोज में सदैव प्रयत्नरत रहना चाहिए।  इससे मन में द्वेशभाव समाप्त होगा।

2.      धर्मनिर्पेक्षता – जीव ही शिव है – ऐसा स्वामी जी ने कहा।  उन्हों ने समझाया कि मात्र दया भाव ही नहीं, जीव की सेवा ही शिव सेवा है।  यह संदेश मानव सेवा के यथार्थ स्वरूप को प्रतिपादित करता है।  यह प्रेरणा देता है कि उठो और निष्कामभाव से मानवसेवा में समर्पित हो जाओ।  सभी धर्मों का अन्तिम सार एक ही ईश्वर की पहुँच तक है। ऐसे में धर्म के नाम पर क्लेश (आपसी लड़ाई, धर्मपरिवर्तन के प्रलोभन या बाध्यकरना)  न करते हुए अपने अपने धर्म का अनुसरण ही श्रेयस है। 

3.      Value Education – स्वामी मानते थे कि विद्योपार्जन केवल पैसा कमाने के लिए है। शास्त्रनिहित सत्यों की उपलब्धि तो नहीं होती।  इस संदेश  अनुसार स्कूली शिक्षा में ज्ञानार्जन के साथ value education को विशेष महत्व देने का महत्व समझ आता है।  एक निश्चित आयु के बाद धनार्जन की इच्छा समाप्त हो जाती है।  अनेक अनुभवों से पता चलता है कि ऐसे समय में पछतावा होता है कि जीवन में धन के अलावा कुछ और नहीं किया।  अतः बचपन से ही जगत संबंधी शिक्षा को बढ़ावा मिलना चाहिए।

4.       काम-कंचन – यह स्वामी जी का एक महत्वपूर्ण संदेश था।  काम – Lust/Desires और कंचन – Gold/Wealth.  इस संदेश का सार यह है कि अनुशासित जीवन शैली अपनाने से व्यर्थ की कामनाओं से मन विरक्त होता है।  मंत्र के नियन्त्रण से इन्द्रियाँ वश में रहती हैं।  आज अगर अनावश्यक धन संचयन की अभिलाषा कम हो जाए तो दान की प्रवृत्ति बढ़ेगी और मानवता प्रसन्न रहेगी।

5.      अविद्यामाया और विद्यामाया -  वेदान्त दर्शन कहते हैं कि अज्ञान को मिटा कर ही माया के आवरण को हटाया जा सकता है।  इस बात को समझाने के लिए स्वामी जी ने माया के दो भेद किए

a.      अविद्यामाया – यह अंधकार का द्वार है, जिसमें वासना, काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, अंहकार इत्यादि पनपते हैं।  यह अध्यात्म को धरातल पर पटक देता है।  इससे जीव को जन्म-मरण के चक्र में निरंतर घूमते रहना पड़ता है।

b.      विद्यामाया – यह अध्यात्म जगत की ऊँचाईयों पर ले जाता है।  इससे अध्यत्मिक चेतना, तत्त्वज्ञान, दयाभाव, प्रेमभाव, स्वच्छमन, भक्तिभाव की वृद्धि होती है।  आधुनिक शिक्षा में इस भेद को समझने की शक्ति प्रदान करने का महत्व दिया जाना चाहिए।  हर विद्यार्थि को अध्ययन के क्षेत्र की सही समझ होगी और मानवता के धर्म का विकास होगा।

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