आत्मनो गुरुरात्मैव पुरषस्य विशेषतः।
यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोऽसावनुविन्दते।।
समस्त प्राणियों का विशेषकर मनुष्य की आत्मा अपने हित और अहित का उपदेशक गुरु है। क्योंकि मनुष्य अपने प्रत्यक्ष अनुभव और अनुमान के द्वारा अपने हित-अहित का निर्णय करने में पूर्णतः समर्थ है।
श्रीमद्भाग्वतपुराण ११-०७-२०
परमभाग्यवान अवधूत दत्तात्रेय जी के चौबीस गुरु
1. पृथ्वी
2. वायु
3. आकाश
4. जल
5. अग्नि
6. चन्द्रमा
7. सूर्य
8. कबूतर
9. अजगर
10. समुद्र
11. पतंग
12. भौंरा या मधुमक्खी
13. हाथी
14. शहद निकालनेवाला
15. हरिन
16. मछली
17. पिङ्गला नगरवधु
18. कुरर पक्षी
19. बालक
20. कुँआरी कन्या
21. बाण बनाने वाला
22. सर्प
23. मकड़ी
24. भृङ्गी कीट
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