Sunday, 25 July 2021

यज्ञोपवीत संस्कार एवं धारण करने की विधि


यज्ञोपवीत संस्कार एवं धारण करने की विधि

हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणा प्रतिष्ठिताः।

हृदि प्राणश्च ज्योतिश्च त्रिवृत्सूत्रं च यन्महत्।  हृदि चैतन्येतिष्ठति।

 

(हमारे) हृदय में देवताओं का निवास स्थान है, हृदय में प्राण प्रतिष्ठित हैं।  हृदय में प्राण एवं ज्योति (ऊर्जा) है।  इन तीन स्वरुपों में हमारे अन्दर परमात्मा निवास करते हैं।  माना जाता है कि तीन तन्तुओं वाला सूत्र (यज्ञोपवीत) इस तथ्य का  सूचक है।  परमात्मा हृदय में चैतन्य रुप में रहता है।

 

यज्ञोपवीत के धारण करने की प्रथा कब से प्रारंभ हुई, इसका कोई प्रमाण नहीं है।  परन्तु माना जाता है कि यह प्रथम प्रजापति के साथ ही उत्पन्न हुआ है, जिस का अनुपालन आरंभ से ही किया जाता रहा है।  जिस प्रकार सूत्र में मनके पिरोए जाते हैं, उसी प्रकार परब्रह्म में समस्त विश्व पिरोया हुआ है। 

यज्ञोपवीत यह प्रकट करता है कि परब्रह्म हृदय में निवास करता है,  इसलिए यज्ञोपवीत को सूत्र कहा जाता है।  सूत्र का अर्थ है ‘परमपद’।  इस सूत्र के स्वरुप को जानने वाला ही वेद का अधिकारी तथा ज्ञाता हो सकता है।   ग्राहस्थ और वानप्रस्थ को दो यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए। 

निःसंदेह, द्विजों को यज्ञोपवीत सदैव धारण किए रहना चाहिए।  ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ और वानप्रस्थ – तीनों आश्रमों में यज्ञोपवीत अनिवार्य रूप से धारण करना चाहिए।  शास्त्रोक्त विधि से यज्ञोपवीत धारण करना एवं सदैव नियमों का पालन करनें का कोई विकल्प नहीं है।  नियमों की अवहेलना करने वाला दोषी होता है तथा दुष्परिणाम भोगता है।  यज्ञोपवीत की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 

यज्ञोपवीत का अशुद्ध होना

·       कंधे से सरक कर बाँये हाथ से नीचे गिर जाना।

·       किसी धागे का टूट जाना।

·       शौच आदि के समय पर कान पर रखना भूल जाना।

·       अस्पृश्य अंगों से स्पर्श हो जाना।

यज्ञोपवीत को बदलने की आवश्यकता

प्रयत्न यही होना चाहिए कि जनेऊ कम से कम बदलने की आवश्यकता पड़े।  परंतु, निम्नलिखित अवस्थाओं में या यज्ञोपवीत के अशुद्ध होने पर उसे निश्चय ही बदल लें।

·       उपाकर्म में

·       जनना शौच और मरणाशौच में

·       श्राद्ध, यज्ञ आदि में

·       चन्द्र एवं सूर्यग्रहण के उपरांत

 

नूतन यज्ञोपवीत धारण विधि

 

ब्रह्ममुहूर्त्त में उठ कर शौच आदि मे निवृत होकर शुद्धी, आचमन, प्राणायाम आदि के बाद नूतन यज्ञोपवीत धारण को अभिमंत्रित करें तथा धारण करने का संकल्प लें।  अपने वर्ण के अनुकूल पवित्र जनेऊ अपने कुलके गुरु (अथवा मंदिर के ब्राह्मण) से प्राप्त करें।   

यज्ञोपवीत पूजन

श्रावण में यज्ञोपवीत की पूजा करके वर्ष भर के लिए रखने का नियम है।  अन्यथा, निम्न विधि से यज्ञोपवीत का संस्कृत करें।

·       यज्ञोपवीत को पलाश या पीपल के पत्ते पर या शुद्ध पात्र में रखें। 

·       जल छिड़क कर शुद्ध करें।

·       निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हए अक्षत अथवा एक-एक फूल को यज्ञोपवीत पर अर्पण कर तन्तुओं और ग्रन्थों में देवताओं का आवाहन करें।

नौ तन्तुओं में आवाहन –

1.    प्रथमतन्तौ ॐ ओंकारमावाहयामि।

2.    द्वितीयतन्तौ ॐ अग्निमावाहयामि।

3.    तृतीयतन्तौ ॐ सर्पानावाहयामि।

4.    चतुर्थतन्तौ ॐ सोममावाहयामि।

5.    पञ्चमतन्तौ ॐ पितृनावाहयामि।

6.    षष्ठमतन्तौ ॐ प्रजापतिमावाहयामि।

7.    सप्तमतन्तौ ॐ अनिलमावाहयामि।

8.    अष्टमतन्तौ ॐ सूर्यमावाहयामि।

9.    नवमतन्तौ ॐ विश्वान् देवानावाहयामि।

ग्रन्थों में आवाहन –

10. प्रथम ग्रन्थौ ॐ ब्रह्मणे नमः, ब्रह्माणमावाहयामि।

11. द्वितीय ग्रन्थौ ॐ विष्णवे नमः, विष्णुमावाहयामि।

12. तृतीय ग्रन्थौ ॐ रुद्राय नमः, रुद्रमावाहयामि।

पूजन

प्रणवाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः। 

इस मंत्र का उच्चारण करके यथास्थानं न्यसामि कहकर उन तन्तुओं पर हल्दी, कपूर-केसर युक्त चन्दन आदि लगा कर पूजा करें।

अभिमन्त्रित करना

पूजा के बाद यज्ञोपवीत को दस बार गायत्री मंत्र से अभिमन्त्रित करें।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्।  

मंत्र का अर्थभूः सत् (सूर्य के द्वारा प्रकाशित क्षेत्र), भुवः चित् (पृथ्वी से सूर्यमण्डल के बीच का क्षेत्र), स्वः आनन्द स्वरुप (सूर्यमण्डल से ध्रुवमण्डल के बीच का क्षेत्र) सवितुः देवस्य सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्माके तत् वरेण्यम् भर्गः उस प्रसिद्ध वरणीय तेज का (हम) ध्यान करते हैं यः जो परमात्मा नः हमारी धिवः बुद्धि को (सत् की ओर) प्रचोदयात् प्रेरित करे।

यज्ञोपवीत धारण करने का संकल्प

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः

ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे ..........स्थाने ..........नामसंवत्सरे ..........ऋतौ ..........मासे कृष्ण/शुक्ल पक्षे ..........तिथौ ..........दिने ..........काले ..........गोत्रः, ..........शर्मा (वर्मा, गुप्तः) अहं प्रातः काले सर्वकर्मसु शुद्धयर्थम् श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं उपात्तदुरितक्षयपूर्वक श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं च यज्ञोपवीत धारणं करिष्ये।

संकल्प का अर्थ –  ओंकारस्वरुप भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए आज ब्रह्माजी के दूसरे परार्ध (51वें वर्ष में) में श्री श्वेतवाराह नाम कल्प में वैवस्वत मन्वन्तर में अठ्ठाइसवें (28वें) कलियुग में कलियुग के पहले चरण में बुद्ध के अवतार वाले युग में पृथ्विलोक पर भरत खण्ड में भारत देश में ....... नगर में ....... नामक संवत्सर में .......  ऋतुमें .......  महिनें में कृष्ण/शुक्ल पक्षमें ....... तिथि में ....... वार में ....... गोत्र का ....... शर्मा (वर्मा, गुप्ता) नाम वाला मैं, प्रातः काल में सभी कार्यों के लिए शुद्धि के लिए श्रुतियों, स्मृतियों, पुराणों में उल्लिखित फल प्राप्ति के लिए और श्रीपरमेश्वर को प्रिय लगने केलिए यज्ञोपवीत धारण करुँगा।

नोट - संकल्प में रिक्त स्थान भरने के लिए परिशिष्ठ देखें।

यज्ञोपवीत धारण

विनियोग – निम्नलिखित विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़ें।

ॐ यज्ञोपवीतमिति मन्त्रस्य परमेष्ठी ऋषिः, लिंगोक्ता देवताः, त्रिष्टुप् छन्दः, यज्ञोपवीत धारणे विनियोगः।

विनियोग का अर्थ – यज्ञोपवीतमिति... मंत्र के परमेष्ठी ऋषि हैं, लिंगोक्ता देवता हैं, त्रिष्टुप छन्द है। इस मंत्र का प्रयोग का यज्ञोपवीत धारण करने में होता है।

धारण – निम्न मंक्ष पढ़कर एक जोड़ा जनोऊ धारण करें।

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं   प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं     यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

श्लोक का अर्थ – यज्ञोपवीत परम पवित्र है।  यह प्रथम प्रजा-पति के साथ उत्पन्न हुआ आयुष्य देने वाला है – ऐसा समझ कर तुम उत्तम और उज्जवल यज्ञोपवीत धारण करो,  यह यज्ञोपवीत तुम्हारे लिए बलरुप सिद्ध हो।

ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि।

आचमन

नूतन यज्ञोपवीत धारण करने के बाद आचमन करें।

जीर्ण यज्ञोपवीत का त्याग

निम्न मंत्र पढ़कर पुराने यज्ञोपवीत को कण्ठी जैसा बनाकर सिरपर से पीठकी ओर से निकालकर उसे जल में प्रवाहित कर दें।

एतावद्दिनपर्यन्तं   ब्रह्म    त्वं    धारितं    मया।

जीर्णत्वात् त्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम्।।

गायत्री मंत्र पाठ

यथा शक्ति गायत्री मंत्र का पाठ करें।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।  धियो यो नः प्रचोदयात्।  

मंत्र का अर्थभूः सत् (सूर्य के द्वारा प्रकाशित क्षेत्र), भुवः चित् (पृथ्वी से सूर्यमण्डल के बीच का क्षेत्र), स्वः आनन्द स्वरुप (सूर्यमण्डल से ध्रुवमण्डल के बीच का क्षेत्र) सवितुः देवस्य सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्माके तत् वरेण्यम् भर्गः उस प्रसिद्ध वरणीय तेज का (हम) ध्यान करते हैं यः जो परमात्मा नः हमारी धिवः बुद्धि को (सत् की ओर) प्रचोदयात् प्रेरित करे।

भगवान को अर्पण

निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवान् को अर्पित करें।

ॐ तत्सत् श्रीब्रह्मार्पणमस्तु।

हाथ जोड़कर भगवान का ध्यान करें।


 

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