Sunday, 25 July 2021

दूसरे गुरु - वायु

 



अवधूत जी के दूसरे गुरु – वायु

 

शरीर के भीतर रहनेवाले वायु – प्राणवायु से यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वह आहारमात्र की इच्छा रखता है और उसकी प्राप्ति से ही संतुष्ट हो जाता है, वैसे ही साधक को भी चाहिए कि जितने से जीवन निर्वाह हो जाय, उतना भोजन कर ले।  इन्द्रियों को तृप्त करनेके लिए बहुत से विषय न चाहे।  संक्षेप में उतने ही विषयों का उपयोग करना चाहिए, जिनसे बुद्धि विकृत न हो, मन चञ्चल न हो और वाणी व्यर्थ की बातों में न लग जाए।

शरीर के बाहर रहने वाले वायु से मैने यह सीखा है कि जैसे वायु को अनेक स्थानों में जाना पड़ता है, परंतु वह कहीं भी आसक्त होता, किसी का भी गुण-दोष नहीं अपनाता, वैसे ही साधक पुरुष भी आवश्यकता होने पर विभिन्न प्रकार के धर्म और स्वभाव वाले विषयों में जाय, परंतु अपने लक्ष्य पर स्थिर रहे।  किसी के गुण या दोष की ओर झुक न जाए, किसी से आसक्ति या द्वेष न कर बैठे। 

गंध वायु का गुण नहीं पृथ्वी का गुण है।  परंतु वायु को गंध का वाहन करना पड़ता है।  ऐसा करने पर भी वायु शुद्ध ही रहता है, गंध से उसका सम्पर्क नहीं होता। वैसे ही साधक का जबतक इस पार्थिव शरीर से सम्बन्ध है, तबतक उसे उसकी व्याधि पीड़ा और भूख-प्यास आदि का भी वहन करना पड़ता है।  परंतु अपने को शरीर नहीं, आत्मा के रूप में देखने वाला साधक शरीर और उसके गुणों का आश्रय होने पर भी उनसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है।


No comments:

Post a Comment

सृष्टि के सात स्तर

  “ यह प्रकृति पुरुष और स्त्री के  मैथुन   शक्ति के अनुसार विकसित और प्रकाशित हुई है ”   प्रकृति क्या है? ब्रह्मणः सकाशान्नानाविचित्...