Friday, 23 July 2021

अवधूत के पहले गुरु - पृथ्वी




पृथ्वी गुरु

भूतैराक्रम्यमाणोऽपि धीरो दैववशानुगैः।

तद् विद्वान्न चलेन्मार्गादन्वशिक्षं क्षितेर्व्रतम्।।

मैने पृथ्वी से उसके धैर्यकी, क्षमाकी शिक्षा ली है। लोग पृथ्वी पर कितना आघात और क्या-क्या उत्पात नहीं करते; परंतु व न तो किसी से बदला लेती है और न रोती चिल्लाती है।  संसार के सभी प्राणी अपने अपने प्रारब्धके अनुसार चेष्टा कर रहे हैं, वे समय समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार से जान या अनजान में आक्रमण कर बैठते हैं।  धीर पुरुषको चाहिए कि उनकी विवशता समझे, न तो अपना धीरज खोवे और न क्रोध करे।  अपने मार्गपर ज्यों का यों चलता रहे।

 

शश्वत्परार्थसर्वेहः परार्थैकान्तसम्भवः।

साधुः शिक्षेत भूभृत्तो नगशिष्यः परात्मताम्।

पृथ्वी के ही विकार पर्वत और वृक्ष से मैनें यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे उनकी सारी चेष्टाएँ सदा-सर्वदा दूसरों के हित के लिए ही होती हैं, बल्कि यों कहना चाहिए उनका जन्म ही एकमात्र दूसरों का हित करने के लिए हुआ है, साधु पुरुष को चाहिए कि उनकी शिष्यता स्वीकार करके उनेस परोपकार की शिक्षा ग्रहण करे।

 





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