Thursday, 23 July 2020

उत्तरायण : ज्योतिष संस्कृति और अध्यात्मिक संगम


उत्तरायण : ज्योतिष संस्कृति और अध्यात्मिक संगम 

ज्योतिर्विज्ञान में नए विचार और अनुप्रयोग के अध्याय 6.5 पृष्ठ 431 पर मेरे विचार

सभ्यता के आरंभ से ही मनुष्य विभिन्न तरीकों द्वारा स्वयं को प्रकृति से जोड़ कर देखता रहा है।  इसके अनुरूप ही मानव चिन्तन का विकास हुआ।  कुछ विलक्षण बौद्धिक क्षमता वालों का चिन्तन उस स्तर पर पहुँचा जहाँ से वे मंत्रदृष्टा ऋषि या उससे भी ऊपर मुनि की श्रेणी के व्यक्ति कहलाए।  इस प्रकार अध्यात्मिक चिन्तन गहन होता चला गया।

6.5.2 में चार प्रकार के प्रभावों का वर्गिकरण सराहनीय है।
1.         प्राकृतिक (Natural)
2.         शारीरिक (Physical)
3.         मानसिक (Psychological)
4.         अध्यात्मिक (Spiritual)

संभवतः पहले तीन वर्गों की एकात्मता ही अध्यात्मिक प्रभाव को विकसित करती है।  और इसी उपक्रम में यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे प्रत्युक्त लगता है।

आकाशीय पिण्डों के सूक्ष्म प्रभाव को वैज्ञानिक तरीकों से प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।  उदाहरण के लिए सौर धब्बों का पृथ्वी के वातावरण पर प्रभाव (प्राकृतिक), रक्त-मेदा (Blood Serum) में बदलाव जैसे (शारीरिक), स्वभाव में परिवर्तन (मानसिक) विकार आदि।

जब प्रथम तीन लक्षण प्रभावित होगें तो इनको एकात्म करने वाला चतुर्थ तो स्वतः ही परिवर्तित होगा।

अध्यात्मिक स्थिरता (जहां परिवर्तन नहीं होते) संभवतः मोक्ष लाभ प्रदायी हो जाती है।  मन परम पवित्र हो जाता है। जिस स्तर पर पहुँच कर जीव जन्म-मरण के चक्र से उबर जाता है। 

इस सब विचारों से उत्तरायण व दक्षिणायन सूर्य का अध्यात्मिक प्रभाव युक्तिपूर्ण लगता है।

जैसा की 6.5.3 में विचार प्रकट किए गए हैं – निश्चय ही ज्योतिष विद्या के अभिलाषियों को सर्वप्रथम श्रीमद भगवत गीता फिर पुराण-उपनिषद-दर्शन शास्त्रों का गहन अध्ययन करना चाहिए तभी कर्मफल की प्रवृत्ति और अध्यात्मिक विचारों को परिपक्व किया जा सकता है।
इसके उपरांत ही देवयान-पितृयान मार्गों की अनुभूति हो सकेगी।

मकर संक्रान्ति वार्षिकोत्सव
उत्तरायण पर्व का निर्णय भारतीय ज्योतिष की सबसे बड़ी और प्रत्यक्ष भूल है।  नक्षत्रपरक पर्व को राशियों में बांधकर अकाल पर्व मनाया जाता है।  यहाँ से अंधविश्वास का आरंभ होता है।    अब मकरसंक्रान्ति को एक पर्व की श्रेणी नहीं मानकर मात्र वार्षिक उत्सव समझना चाहिए।  मकर संक्रान्ति का उत्तरायण से संबंध विच्छेद हो गया है।
जन्मोत्सव- इसी प्रकार से वार्षिक जन्मोत्सव भी मात्र मनपसंद समय पर एक उत्सव रह गया है।  ग्रेगोरियन जन्म तारीख का वास्तविक जन्म तिथि, नक्षत्र या सूर्य-स्थिति से कुछ लेना देना नहीं।  ऊपर से निशिथ काल में ही जन्मोत्सव का प्रचलन अज्ञानता का उदाहरण है। (निशिथ काल में योगी-भोगी-रोगी ही जगते हैं। इसके अलावा तो पिशाच-निशाचर ही घूमते हैं)
संभवतः यह प्रमाण है कि त्रिविध तापो में से आधुनिक ज्योतिषी मात्र अधिभौतिक ताप शमन का ही निष्फल प्रयत्न करते रहते हैं।  अन्य दो ताप (आधिदैविक, अध्यात्मिक ताप) के बने रहने से मानव का सही मायनों में कल्याण नहीं हो रहा है।  और ज्योतिष निष्फल हो रहा है।

उत्तरायण सूर्य देवताओं का दिन।  अध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक। दक्षिणायन राक्षसों का दिन।  अध्यात्मिक चिन्तन का प्रतीक।  उत्तरायण को शुभ माना गया है।  रवि को उत्तरायण में बलवान माना गया है।  रवि ही उत्तरायण के अधिपति हैं।  परंतु फलित में उत्तरायण सूर्य के विषय में श्री एच एन काठवे अपने अनुभव से कहते हैं –
“रवि दक्षिणायन में ही प्रबल होता है, क्योंकि जगत के बड़े राजनीतिज्ञ नेता, कूटनीतिज्ञ, डॉक्टर, सर्जन, कानून विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, मिल मालिक, कवि, उपन्यासकार, नाटककार इनका जन्म बहुतायत से दक्षिणायन में ही हुआ दक्षिणायन अर्थात कर्क से धनु तक का रवि मनुष्य को भाग्यशाली बनाता है। इन राशियों में वह विश्व का विकास करता है।  उत्तरायण रवि लड़ाई झगड़े और अपना हक जमाने की प्रवृत्ति को बढ़ता है।  दक्षिणायन में इसके विपरीत दैवी वृत्तियाँ बढ़ती हैं।” (This point needs to be verified)

मेरा मानना है कि इस अध्याय पर और अधिक चर्चा, चिन्तन तथा शोध होना चहिए।

धन्यवाद।

S.K. Mishra
An Astro Enthusiast

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