Tuesday, 28 July 2020

सौरमान ऋतु का प्रयोग सही है।



संकल्प में सौरमान ऋतु का प्रयोग सही है

 

स्कंधपुराण के अनुसार भूमण्डल में सबका समय सौर, सावन, चान्द्र था नाक्षत्र – इन चार प्रकार के मानों से व्यतीत होता है।  पृथ्वी पर इन चारों के सिवा दूसरा कोई मान नहीं है।  इसी मान से देवता, दैत्य और मनुष्य सब का व्यवहार चलता है।

 

वर्षमान

सौरमान से 365 दिनों का एक वर्ष होता है।

सावन मान से 360 दिनों का एक वर्ष होता है।

चान्द्रमान से 254 दिनों का एक वर्ष होता है।

नाक्षत्रमान से 335 दिनों का एक वर्ष होता है।

 

वर्षप्रयोग

सर्दी, गर्मी और वर्षा इत्यदि सौरमान से होती है। 

अग्निष्टोम आदि यज्ञ, उत्सव और विवाह से सावनमान से किए जाते हैं। 

व्याज आदि व्यवहार मलमासयुक्त चान्द्रमास से होता है।

नाक्षत्रमान से ग्रहों की चाल होती है।

 

 

ज्यादातर व्रत-पर्व-कथाएँ स्कंध पुराण से ही व्यवहार में लाई गयी हैं।  ऐसे में धर्माचार्यों नें स्कंधपुराण के इस भाग को अज्ञात कारण वश अनदेखा कर दिया है।  इसीवजह से संकल्पादि में चान्द्रमान से ऋतुओं के गलत रूप से प्रयोग करते  है। 

निर्णयसिन्धु में ऋतुनिर्णय पर बतलाया गया है कि

ऋतुर्मासद्वयात्मा।  मलमासे तु मासद्वायत्मक एको मासः, तेन मासद्वायत्मकत्वमविरुद्धम।  स द्वेधा चान्द्रः सौरश्च।  चैत्रारम्भो वसन्तादिश्चान्द्रः।  मीनारम्भो, मेषारम्भो वा सौरः।  मीनमेयोर्मेषवृषयोर्वा वसन्तः, इति बौधायनोक्तेः”।

अर्थात दो महीनो को ऋतु कहते हैं, मलमास में तो दो महीनो के एक महीना कहते हैं।  इससे मास द्वयात्मक को ऋतु कहने में कोई आपत्ति नहीं है।  वह ऋतु दो प्रकार की है – चान्द्र और सौर।  चैत्र से वसन्त आदि ऋतु आरंभ होती है। वह चान्द्र संज्ञक है।  मीन या मेष से आरंभ होती है वह सौर है। बौधायनमत से मीन-मेष या मेष या वृष से वसन्त का प्रारंभ होता है।

त्रिकाण्डमण्डन –“श्रौतस्मार्तक्रियाः सर्वाः कुर्याच्चान्द्रमासर्तुषु।  तदभवे तु सौरर्तुष्विति ज्योतिर्विदां मतम्”।  अर्थात श्रौत और स्मार्त सब क्रियाओँ का प्रारंभ चान्द्र ऋतुओं में करे।  या अभाव में तो सौर ऋतुओं से करे – यह ज्योतिर्विदों का मत है।

अब यहाँ अभाव क्या हो सकता है?  मेरे विचार से अभाव ऋतुओं का ही हो सकता है।  अगर किसी चान्द्र मास में वह ऋतु नहीं है तो सौर मास से ही ऋतु का ज्ञान करना चाहिए।

 

निष्कर्ष यह निकलता है कि संकल्पादि में सौरमान से ही ऋतुओं का प्रयोग करना शास्त्रोक्त है।


लेखक - शशिकान्त मिश्र 

1 comment:

सृष्टि के सात स्तर

  “ यह प्रकृति पुरुष और स्त्री के  मैथुन   शक्ति के अनुसार विकसित और प्रकाशित हुई है ”   प्रकृति क्या है? ब्रह्मणः सकाशान्नानाविचित्...