
ज्योतिषीय उपचार कैसे कारगर
हो सकते हैं?
मानव के तीन शरीर
होते हैं
1 .
स्थूल
शरीर
2 .
सूक्ष्म
शरीर
3 .
कारण
शरीर
कर्म
बंधन से बंधा मनुष्य जब जन्म लेता है तो ग्रहों का प्रभाव इन तीनो शरीरों पर ही
पड़ता है। या ग्रह इन तीनों शरीरों से
संबंधित शुभाशुभ फलों के संकेतक होते हैं।
अतः जब तक हम उस ग्रह का प्राकृतिक (स्थूल) शरीर पर, आत्मा (सूक्ष्म
शरीर) पर तथा संस्कार पर (कारण शरीर) पर प्रभाव न जान लें तब तक किसी भी ग्रह के
प्रभाव को पूर्ण रूप से नहीं समझा जा सकता है।
कुण्डली
तो भाग्य का सूचक मात्र है जिसे ज्योतिषी पढ़ने का प्रयत्न करता है। इस भाग्य का निर्माता तो स्वयं जातक है जो अपने कर्मों से
ही अपने भाग्य को बनाते हैं।
कर्म
बंधन में बंधा मानव अपने कर्मों के फलों को भोगेगा ही। यह निश्चित है की कर्मफल को टाला नहीं जा सकता
है। अतः केवल ग्रहजनित दोषों (संकेतों) से सारी
समस्याओं का हल नहीं खोजा जा सकता है। ज्योतिषी को यह समझना आवश्यक है कि किस प्रकार
के कर्मों के परिणाम को जातक भोग रहा है।
ग्रहों की शान्ति के पहले जातक को उन दुष्कर्मों का प्रायश्चित कर्म भी
अवश्य करने चाहिए। अन्यथा “केवल उपचार”
से कर्म फल टल जाएगा परंतु मिटेगा नहीं।
संक्षेप में - ग्रहजनित
दोष को मिटाने के लिए उपचार तभी सफल होगें जब तक उपचार में निम्न लिखित भी शामिल किए
जाए –
1 .
प्रायश्चित
कर्म की अनिवार्यता
2 .
कर्म
की पुनरावृत्ति न करने का संकल्प
3 .
परमार्थ
महत्वपूर्ण - केवल उपचार देकर तो ज्योतिषी भी जातक के साथ कर्मबंधन
में स्वयं को और अधिक जकड़लेता है।
उदाहरण -
लौकिक भाषा में अगर समझाएँ तो एक व्यक्ति चोरी करता है। सजा तो मिलनी ही
चाहिए। परंतु वह अधिकारियों को घूस (रूपी
पूजा) दे कर बच जाता है। अब अधिकारी भी उस
पाप कर्म का भागीदार हो जाता है। मानलो
कुछ समय पश्चात पुनः चोरी पर कार्यवाही होती है और चोर घूस के बारे में बतलाता है
तो घूसखोर अधिकारी भी दण्ड का भागी दार बन जाता है। अतः
आवश्यक है कि ऊपर बताई बातों के साथ ज्योतिषी को स्वयं भी प्रायश्चित कर्म करते
रहना चाहिए।
लेखक - शशिकान्त मिश्र
No comments:
Post a Comment