Friday, 24 July 2020

विस्मयकारी षष्ट्य (sexagesimal) पद्धति की उत्पत्ति


विस्मयकारी षष्ट्य (sexagesimal) पद्धति की उत्पत्ति

लेखक – शशिकान्त मिश्र

वैदिक गणित में दशमलव पद्धति की संख्या का प्रयोग मिलता है।  एक से आरंभ कर के महौघ (1062 अर्थात 1 के आगे बासठ(६२) शून्य लगाने पर प्राप्त संख्या)  का उल्लेख मिलता है। 

परंतु आश्चर्य होता है कि इस विकसित प्रणाली में 60 के आधार वाली गणना पद्धति का विकास कैसे हुआ? 

60 के आधार वाली पद्धति को सैक्सागैसिमल (sexagesimal) या षष्ट्य पद्धति कहा जा सकता हैं।   इस पद्धति का प्रयोग मुख्य रूप से निम्नलिखित दो स्थानों में किया जाता है :-

1     .      समय से संबंधित गणित में षष्ट्य पद्धति - घड़ी के 1 घण्टे में 60 मिनट होते हैं।  तथा हर एक मिनट में 60 सैकेण्ड होते हैं। अधिक सूक्ष्मता के लिए सैकेण्ड के भी 60 भाग किए जाता हैं।

1 घण्टा = 60 मिनट
1 मिनट = 60 सैकेण्ड
या
1 घटि = 60 कला
1 कला = 60 विकला
1 विकला = 60 प्रतिविकला

2     .      ज्यामिति (geometry) में भी किया जाता है  किसी कोण के 1 अंश में 60 कला/मिनट होती हैं, 1 कला/सैकेण्ड में 60 विकला और 60 विकला में 60 प्रतिविकला इत्यादि।  अंग्रेजी में  समय और कोण के मिनट/सैकेण्ड की सही संज्ञा arc minute/ arc second है। (फ्रांस तथा अनेक देश ज्यामिति में षष्ट्य पद्धति का प्रयोग न करते हुए ग्रेडियन और रेडियन जैसी ईकाइ का भी प्रयोग करते हैं।)

1 अंश = 60 कला या मिनट
1 कला= 60 विकला या सैकेण्ड

60 का ही प्रयोग क्यों?
सैक्सागैसिमल पद्धति का प्रयोग संभवतः आकाश दर्शन से आरंभ हुआ है।  निम्नलिखित तीन आकाशीय घटनाएँ बिलकुल सहता से देखी जा सकती हैं:-
·      
       1.  सूर्य का निश्चित समय पर निरंतर उदित होना (या अस्त होना या मध्य आकाश में आना)
·       2.  चन्द्रमा का हर 30 दिन पर लुप्त होना (या पूर्णिमा का होना)
·      3.  सूर्य का निश्चित दिनों के बाद पूर्व दिशा में एक ही स्थान से उदित होना (उत्तरायण/दक्षिणायन होना या सम्पात के दिन ठीक पूर्व दिशा में उदित होना)
      4. चन्द्रमा के पर्व दिवस (पूर्णिमा/अमावस्या) की पुनरावृत्ति 30 दिनों के बाद दिखती है।  इस अवधी को महिना कहते हैं।  सूर्य भी एक निश्चित पथ (जिसे क्रान्त-वृत्त कहते हैं) पर चलते हुए आकाश में अपनी स्थिति की पुनरावृत्ति करते रहता है।  सूर्य की एक स्थिति से दोबारा उसी स्थिति में आने को एक वर्ष कहते हैं।   इसी दौरान (एक वर्ष की अवधि में) प्रायः चन्द्रमा के 12 पर्व दिवस (अमावस्या/पूर्णिमा) होते हैं।
  
      अतः सूर्य को अपने गोल पथ (क्रान्तिवृत्त) पर चलनें में अमूमन 360 दिन लगते हैं।  इतने दिनों में चन्द्रमा 12 बार अपने 30 दिनों के चक्र को पूरा करता है।

      12 और 30 की संख्या 60 को पूरा भाग करती हैं (60 is the highest common factor of 12 and 30)।  यह 60 की संख्या 360 को पूर्ण विभाजित करती है।  अतः  12, 30 और 360 से साठ की संख्या का संबंध बनता है।

होरा 24 क्यों?

एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय के काल को विभक्त करने के लिए 60 का प्रयोग किया गया।  दिन के हर भाग को 1 घटि या घड़ि कहते हैं। दिन के 30 घटि और रात के 30 घटि मिल कर एक अहोरात्र का निर्माण करते हैं।  
एक दिन में (क) सूर्य उदित होता है; (ख) मध्य आकाश में आता है; (ग) अस्त होता है। 
- अतः 30 घटि की अवधि वाले दिन के दो भाग (मध्यह्न से पहले और बाद का भाग) 15-15 घटि के होते हैं। 
- इन दोनों भागों को भी आधा करें तो 7.5 घटि के दिन के चार भाग हो जाते हैं।  इन चारों भागों को  मुहूर्त्त कहते हैं।  
- हर मुहूर्त्त के तीन भाग करने 2.5 घटि का एक भाग हो जाता है।  
इस प्रकार दिन के 12 भाग  किए हुए।  ऐसे ही रात के भी चार मुहूर्त्त और 12 भाग होते हैं। 

तः एक अहोरात्र में 2.5 घटि के 24  भाग होते हैं।  इन भागों को होरा कहते हैं।  होरा शब्द से ही hour की उत्पत्ति हुई है।    

इस तर्क को देख कर प्रतीत होता है कि 60 की संख्या है प्राकृतिक संख्या है।  इस संख्या से मिलने वाले संकेत प्रकृति के होते हैं। 


धन्यवाद।
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