Friday, 24 July 2020

राहु-केतु का शुभाशुभ विचार


राहु-केतु का शुभाशुभ विचार

प्रस्तुतकर्ता - शशिकान्त मिश्र
संदर्भ ग्रंथ - लघु पाराशरी


यद्यद्भावगतौ वापि यद्यद्भावेशसंयुतौ।।
तत्तत्फलानि प्रबलौ प्रदिशेतां तमोग्रहौ।।१३।।

अनुवादराहु-केतु जिन-जिन भावों में स्थित हों या जिन-जिन भावों के स्वामियों के साथ बैठे हों, तो उसी के अनुसार शुभाशुभ फल बलानुसार करते हैं।।

टिप्पणी – राहु-केतु किसी भी भाव के स्वामी नहीं हैं।  अतः भावेश सम्बन्धी सिद्धान्तों के अनुसार राहु-केतु का शुभाशुभ विचार नहीं किया जा सकता है।  इसीलिए पाराशर मुनि ने इस श्लोक को रचा है।  राहु केतु पर विचार के लिए निम्न बिन्दुओं की जाँच करें :-
1
        भाव स्थिति -
a.      यह देखें कि राहु-केतु किस भाव में स्थित हैं। 
b.     पाराशरी सिद्धान्तों के द्वारा उस भाव के विषय में जान लें कि वह शुभ है या अशुभ।  यदि राहु-केतु शुभ भाव में स्थित हैं तो शुभफलदायी और यदि अशुभ भाव में स्थित हैं तो अशुभ फलदायी होंगे।
     साहचर्य –
a.      यह देखे कि राहु-केतु किसी अन्य ग्रह के साथ तो नहीं है।
b.     यह देखें कि साथी ग्रह किस भाव का स्वामी है, उसी के अनुरूप फल कहना चाहिए।  जैसे सूर्य के साथ हैं तो सूर्य सदृश, चन्द्र के साथ हों तो चन्द्र सदृश...।
     फल विचार –
a.      राहु-केतु जिस भाव में बैठते हैं, उसके भाव के ग्रह के फल को दूना कर देते हैं,  क्योंकि उसमें राहु-केतु की शक्ति भी आ जाती है।
b.     राहु-केतु  यदि केन्द्र या त्रिकोण में केन्द्रेश या त्रिकोणेश के साथ युति करें तो योगकारक होते हैं।
c.      राहु-केतु का अपना स्वतन्त्र स्वरूप नहीं होता है, इसलिए वे कारक ग्रह की संगति में कारक हो जाते हैं और मारक ग्रह की संगति में मारक हो जाते हैं।
d.     राहु-केतु जिस भाव में हों उसके अनुसार फल देते हैं।
e.      श्लोक में यह शब्द आया है यद्यभ्दावगतौ (यहाँ गतौ द्विवचन है) जिसका अर्थ होता है कि जिस ग्रह का जो-जो भाव हैं – वह ग्रह जो फल करेगा वही उस भाव में बैठा हुआ राहु या केतु करेगा  मान लीजिए कि मिथुन राशि में राहु बैठा है तो मिथुन और कन्या दोनों राशियों के स्वामी बुध हैं, इसलिए राहु चाहे मिथुन में बैठा हो या कन्या में फल बुध के अनुसार ही करेगा।  अतः ग्रह की एक राशि में बैठने पर भी दोनो राशियों का आधिपत्य का फल राहु को दिया गया है।
     दृष्टि –
a.      पाराशरी के कई टीकाकारों ने राहु-केतु का सहावस्थान (एक साथ अन्य ग्रहों के साथ बैठना) तो माना है परंतु राहु-केतु का दृष्टि सम्बन्ध (कोई उनको देखे या ये किसी को देखें) नहीं माना है।
     
        राहु-केतु का यह नियम पूर्णतः दिखाई भी नहीं देता है। 

a.      राहु या केतु चन्द्र या सूर्य के साथ हों तो उनके सदृश फल नहीं दे सकते।
b.     यदि राहु सप्तम भाव में हो तो स्त्री के विषय में अशुभ फल किए बिना रहेगा नहीं।
c.      राहु-केतु का पंचम भाव में सन्तान संबंधी अनिष्ट फल अवश्य देता है।
d.     राहु-केतु 3-6-11 में हो तो इन भावों के फलों की वृद्धि करते हैं। तीसरे में पराक्रम, छठे में शत्रुनाश और ग्यारहवें भाव में धनलाभ करते हैं।
e.      कुछ राहु की राशि कन्या और केतु की राशि मीन मानते हैं।  राहु की उच्च राशि मिथुन व केतु की उच्च राशि धनु मानी गई है।

राहु-केतु राशि चक्रम्

ग्रन्थ
उपग्रह
उच्च राशि
मूलत्रिकोण राशि
स्व राशि
मित्र राशि
पाराशरी
राहु
केतु
वृष
वृश्चिक
मिथुन
कर्क, धनु
कन्या
मीन
-
-
सर्वाथ चिन्तामणि
राहु
केतु
वृष
वृश्चिक
कर्क
मकर
-
-
मेष
तुला
जातकाभरण
राहु
केतु
मिथुन
धनु
-
-
कन्या
मीन
-
-
जैमिनी सूत्र
राहु
केतु
-
-
-
-
कुम्भ
वृश्चिक
-
-

राहु-केतु के योगकारकत्व पर विचार

यदि केन्द्रे त्रिकोणे वा निवसेतां तमो ग्रहो।
नाथेनान्यतरेणाऽपि संबंधाद्योकारकौ।।२१।।
अनुवादराहु या केतु केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हों और केन्द्र में स्थित होकर त्रिकोण से और त्रिकोण में स्थित होकर केन्द्र से सम्बन्ध स्थापित करें तो योगकारक होते हैं।

टिप्पणी – कई स्थानों पर राहु का केन्द्र 4-10 व त्रिकोण 5वें भाव में रहने का फल अनिष्टकारक बताया गया है।  लेकिन इस ग्रन्थ के मतानुसार केन्द्र या त्रिकोण में बैठने वाला पापग्रह उत्तम फल देने वाला है।  इसके अलावा उसका सम्बन्ध केन्द्रेश या त्रिकोणेश से हो तो अधिक उत्तम राजयोग कारक फल देता है। 
परंतु यदि केन्द्रेश पापी हो तो वह यहाँ योगकारक नहीं होगा।  इस जगह राहु-केतु का दृष्टि संबंध नही माना गया है।

राहु-केतु की दशान्तरदशा पर विचार

तमोग्रहौ शुभरूढ़ावसंबंधेन केनचित्।
अंतर्दशानुसारेण भवेतां योगकारकौ।।२१।।
अनुवाद – राहु या केतु यदि शुभ भाव में हों और किसी शुभ ग्रह से सम्बन्ध रखें या न रखें, तब भी अपनी दशा में या अन्तर्दशा में योगकारक होते हैं।

टिप्पणी – राहु व केतु यदि केन्द्र (विशेष रूप से चौथे व दसवें भाव में) या त्रिकोण में स्थित होकर किसी भी ग्रह के साथ सम्बन्ध नही करते हों तो उनकी महादशा में योगकारक ग्रहों की अन्तर्दशा में उन ग्रहों के अनुसार शुभ योगकारक फल देते हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि शुभ भाव में राहु व केतु शुभ सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं करते मात्र वे पाप संबंधी नही होने चाहिए तभी कथित फल देते हैं। 
राहु या केतु यदि कारक नहीं हो और मात्र त्रिकोण में हो तो भी कारक ग्रह की अन्तर्दशा मे शुभ फल देता है।  वह यदि केन्द्र में हो और त्रिकोणेश से सम्बन्ध नही करता हो तो परस्पर दशान्तर्दशा में अशुभ फल ही देता है।
पाप भाव में स्थित राहु या केतु उनके साथ में बैठने वाले शुभग्रहों की अन्तर्दशा पापफल ही देती है, तब पापग्रहों की अन्तर्दशा में तो पापफल देंगे ही।
संदर्भ ग्रंथ  लघु पाराशरी

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