Friday, 24 July 2020

वैश्विक महामारियाँ - सौर धब्बे और ज्योतिष



वैश्विक महामारियाँ - सौर धब्बे और ज्योतिष
Pandemic - Sun Spots and Astrology
Article by - Shashi Kant Mishra, An Astrologer Enthusiast from Gwalior

क्या है सूर्य चिह्न ?

सूर्य के बिम्ब में दिखने वाले काले धब्बों को सूर्य चिह्न कहा जाता है।  सूर्य की सतह पर यह धब्बे तुलनात्मक रूप से सतह के ठण्डे भाग होते हैं।  अंग्रेजी में इन्हे Photosphere या Sun Spot कहते हैं। 
सूर्य चिह्न संभवतः सूर्य के चुम्बकीय क्षेत्र में अशांति की वजह से बनते हैं।  धब्बों वाले क्षत्रों में अत्यधिक चुम्बकीय गतिविधियाँ महसूस की जाती हैं। धब्बों वाले क्षेत्र से सौर-ज्वालाओं (solar flares) और बड़ी आंधियों को निकलते देखा गया है।  इन्हें Coronal Mass कहते हैं।

धब्बों की संरचना और स्वरूप

सूर्य की सतह पर छोटे छोटे छिद्र (pores) होते हैं।  इन छिद्रों से चुम्बकीय तरंगे निकती रहती हैं। इन छिद्रों का अपना दबाव क्षेत्र होता है।  क्योंकि सूर्य की सतह तरल और गतिशील है, यह छिद्र भी गतिशील होते हैं।  जब कभी दो छिद्र नजदीक आते हैं, इनके बीच स्थित प्लाज्मा पर दबाव पड़ने लगता है।  लगातार दबाव से इनमें एक चमकीला संबंध (पुल) स्थापित होता जाता है।  कुछ अंतराल बाद दोनों छिद्र आपस में जुड़ कर एक बड़े छब्बे में परिवर्तित हो जाते हैं।  इन शक्ति क्षेत्रों के बीच परिवर्तन की वजह से चुम्बकीय क्षेत्र की गतिविधियाँ भी बढ़ जाती हैं जिसके कारण सूर्य मण्डल में प्लाज्मा का भयंकर विस्फोट उठताे हैं।  इन स्थानों से विशालकाया सौर-ज्वाला के भी विस्फोट होते हैं।  सौर ज्वाला इतनी तीव्र होती है कि अगर इन्हें उठा कर राते के आकाश में रख दिया जाए तो पूर्ण चन्द्रमा से भी ज्यादा प्रकाशवान दिखेंगी।
सूर्य के सतह की गर्मी करीब 5,700˚ केल्विन होती है।  परंतु यह धब्बे सतह के ठण्डे क्षेत्र होते हैं जिनकी गर्मी 3,500˚ केल्विन के करीब होती है।
इस प्रकार की ज्वालाएँ इतनी तीव्र होती है कि पृथ्वी पर इनका असर स्पष्टरूप से महसूस किया जाता है। सौर ज्वाला से निकने वाली एक्स-रे तरंगे पृथ्वी पर रेडियो संचार को बाधित कर देती हैं।   इनसे निकलने वाली पराबैगनी किरणें मानवीय-सैटेलाइट्स के पथ (orbit) को भी प्रभावित करती पाई गई हैं।  इन दमकों से GPS गणनाएं भी प्रभावित हो जाती हैं।

(इन्टर्नेट से प्राप्त सौर धब्बे की  तसवीर)


सोलर मैग्जिमम और सोलर मिनिमम

            सूर्य बिम्ब पर सौर धब्बों की संख्या में घटने-बढ़ने के अनुसार एक सौर चक्र को 11.7 वर्ष का होता है।  अर्थात 11.7 वर्ष में सौर धब्बों की संख्या शून्य से बढ़ कर बहुत अधिक हो जाती हैं।  तथा अगले 11.7 वर्षों में घटते हुए पुनः शून्य हो जाती हैं।

सोलर मैग्जिमम या सोलर मैक्स उस अवधी को कहते हैं जब सौर चक्र में सौर गतिविधि सबसे तीव्र होती है।  इस समय सौर धब्बों की संख्या सबसे अधिक होती है।    इसके विपरीत सोलर मिनिमम भी होता है जब सौर धब्बे नगण्य होते हैं या बिलकुल नहीं होते हैं।
दैनिक सूर्य के धब्बों के निरीक्षण से पता चलता है कि सोलर-मैक्स और सोलर-मिनिमम का संयुक्त ग्राफ के भी विशिष्ठ लक्षण हैं।  जहाँ सोलर-मैक्स और सोलर-मिनिम कई वर्षों तक सामान्य से औसतन अधिक रहते हैं  या कई वर्षों तक समान्य से औसतन कम रहते हैं।  सौर धब्बों की ऐसी लम्बी स्थिति पृथ्वी पर विशेष प्रभाव डालती है।


(मेरे द्वारा खींची गई सूर्य बिम्ब की तसवीर)

सूर्य का अपनी घुरी पर घूमना
जिस प्रकार पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, सूर्य भी अपनी धुरी पर घूमते रहता हैं।  सूर्य भी पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर घूमता है।  इसी के साथ सतह पर होने वाली गतिविधियाँ भी चलायमान हो जाती हैं।  सौर धब्बे भी पूर्व से पश्चिक की दिशा में चलते प्रतीत होते हैं।  धब्बे सबसे स्पष्ट दिखते हैं जब वे सूर्य के बिम्ब की ठीक मध्य में होते हैं।  सूर्य 25.6 दिनों में अपनी धुरी पर एक चक्कर पूर्ण करता है।

क्या इन धब्बों के उभरने का पूर्वानुमान किया जा सकता है?

आदि काल से सौर धब्बों को देखा जाता रहा है तथा संकलित किया जाता रहा है।  आधुनिक युग में इन धब्बों के प्रकट होने को वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से देखा जा रहा है।  सौर धब्बों की जानकारी रॉयल औब्सर्वेटरी ऑफ बेलजियम की वेब साईट http://www.sidc.be/silso/ से प्राप्त की जा सकती है।  इस संस्थान के द्वारा यह जानकारी का कोई भी प्रयोग कर सकता है।  इससे प्राप्त डेटाबेस से  साफ पता चलता है कि सौर धब्बों की स्थिति का पूर्वानुमान कुछ हद तक लगाया जा सकता है। 

धब्बों का प्रभाव

1930 में वैज्ञानिकों ने गौर किया था कि धब्बों से निकलने वाली सौर रेडिएशन से मनुष्य के रक्त सिरम (मेदा) में विकार उत्पन्न होता है।   इस विकार से मनुष्य की मानसिकता में परिवर्तन होता है।  कम रक्त सिरम की वजह से  वह उग्र, क्रोधी, आत्मघाती प्रयास करना इत्यादि में प्रवृत्त होता है।  ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी पर विश्वयुद्ध की स्थिति दीर्धकालिक सोलर मैक्स के दौरान होता है। 
यह पाया गया कि वृक्षों के तने में बनने वाले छल्ले रेडिएशन की वजह से अधिक बड़े हो जाते हैं।

सौर ज्वालाओं के अधिकता से वायुमण्डल के कार्बन-14 तथा बैरेलियम-10 आईसोटोप्स का उत्पादन बढ़ जाता है।  यह नाईट्रोजन तथा औक्सीजन के नाभी (nucleus spallation) के विधटन से होता है।  यह दोनों आईसोटोप पृथ्वी पर पाई जाने वाली प्राकृतिक बर्फ के अंदर समाजाती है।  वैज्ञानिक अनुसंधान से इनकी सहायता से सोलर मिनिमम या सोलर-मैक्स का काल पहचाना जाता है।

द्वितीय विश्व युद्ध के समय इलेक्ट्रानिक संचार व्यवस्था के अचानक खराब होने के पीछे का कारण "सौर रेडिएशन" को पाया गया।  अतः सौर धब्बों के उभरने के पूर्वानुमान पर अनुसंधान किया गया।  इस अध्ययन में पता चला कि विभिन्न ग्रहों की एक विशेष कोणीय दूरी पर स्थित होने पर सौर धब्बे ज्यादा बनने लगते हैं।  अतः जब जब ग्रहों की ऐसी विशेष स्थिति बनती है तब सौर धब्बे अधिक बनते हैं जिसके कारणवश पृथ्वी पर जीवन प्रभावित होता है।  यह पूर्वानुमान 95% सही पाया गया है।  इस परिकल्पना को बाद में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के.डी. वुड नें प्रामाणित भी किया।

सौर आंधियों से पृथ्वी के चुम्बकीय घेरे में दबाव परिवर्तन होता है जिसके कारण पृथ्वी के मैगनेटिक कोर में हलचल होती है।  फलस्वरूप सतह पर भूकंप के झटके बढ़ जाते हैं।  अतः सोरल गतिविधियों से भूकंप का भी पूर्वानुमान किया जाता है।  खगोल शास्त्रि जॉन आर. ग्रीब्बिन और खगोल-भौतिकविद स्टीफन एच. प्लैगमैन ने सौर धब्बों और पृथ्वी पर भूकम्प के होने में संबंध पाया।   ज्वालामुखी के संकेत पर भी विचार किया जाता है।
(source - internet)

सौर आंधियों के कारण पृथ्वी के चुम्बकीय घेरे (magnetosphere) में क्षीणता आती है।  इससे interstellar या बाह्य क्षेत्र से कौस्मिक किरणों (cosmic rays) चुम्बकीय घेरे को भेद कर हमारे वायुमण्डल में प्रवेश करती हैं।  इसके साथ नए प्रकार के वायरस, बैक्टीरिया, जीवश्म आदि भी पृथ्वी पर आक्रमण करते हैं।  अतः सोलर मैक्स या मिनिमसम को दौरान नए प्रकार की बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है। या पृथ्वी पर पहले से मौजूद वाईरस आदि सक्रीय हो जाते हैं।

सौर आंधियाँ वायुमण्डल पर भी प्रहार करती हैं।  इसकी वजह से वायुमण्डल के सामान्य प्रवाह में बदलाव आता है और पृथ्वी का मौसम विशेष रूप से परिवर्तित हो जाता है। आज वैज्ञानिक मानने लगे हैं कि सौर धब्बों के बनने में और पृथ्वी पर मौसम के बीच संबंध है।  सोलर मिनिमम के दौरान उष्मता में कमी आने के कारण भी मौसम प्रभावित होता है।  सूखा व हिमयुग जैसी स्थिथियाँ उत्पन्न होते देखी गई हैं।

सत्रहवीं और अठारवीं शताद्बी में करीब 70 वर्ष यूरोपिय देशों ने असामान्य मौसम परिवर्तन को महसूस किया।  इस दौरान यूरोपीय देशों में इतिहास का सबसे कड़ाके की ठण्ड का अनुभव किया जिसे लघु हिमयुग का नाम भी दिया गया।


सोलर मिनिमम का अध्ययन




इस ग्राफ से सहज ही पता चलता कि वर्तमान दौर भी सोलर मिनिमम का है।  ऐसा ही समय कुछ समय के लिए 2009 में भी था।  2009 और 2020 में अंतर पर भी ध्यान दें 2009 में दैनिक सौर धब्बों की संख्या अधिक रही परंतु 2020 में दैनिक अधिकतम सौर धब्बे भी बहुत कम रहे।  अतः इस वर्ष महामारी का प्रकोप विश्व स्तर पर बढ़ गया।  वहीं 2014 के दौर का अमानवीय दौर था जब संपूर्ण अरब देशों का क्षेत्र भयंकर युद्ध के दौर से गुजर रहा था।  युद्ध के बंदि सैनिकों तथा पत्रकारों की निर्मम हत्या के दृष्य का आतंवादी संगठन लाईव प्रसारित कर रहे थे। 

पिछले 1000 वर्षों के विशेष सोलर मिनिमम को दौर

खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिकों ने सोलर मिनिमम के इतिहास पर भी अध्ययन किया।  पिछले एक हजार वर्ष में ऐसे तीन विशेष दौर आये जिसमें सोलर मिनिमम नें वैश्वविक-महामारी का रूप लिया था।  वैज्ञानिक अध्ययन के यह दौर आगे दिए जा रहे हैं –

(1(क)  1400-1520 ई.  इस दौर का नाम Sporer Minimum है।  यह एक लघु हिमयुगका दौर था।  ऐसा माना जाता है कि इस दौरान यूरोपीय देशों में 30 से 50 प्रतिशत आबादी महामारी के चपेट में आए।  इस दौरान की भयावह बीमारी का नाम था इंगलिस स्वैट (English Sweats).  इस बीमारी में अचानक से बुखार, कंपकपी, मचली, शरीर दर्द, पेट दर्द और बेहद अधिक पसीना आता था।  प्रभावित व्यक्ति 24 घंटे के भीतर ही मर जाता था।  इस बीमारी वाला वाईरस आज भी एक रहस्य बना हुआ है।  

(2(ख)  1645-1715 ई. इस दौर का नाम Maunder Minimum है।  यह भी एक लघु हिमयुग का दौर था।  समान्यतः सौर धब्बे चालीस से पचार हजार रहते हैं परंतु इन दिनों सौर धब्बे औसतन 50 रहते थ   सम्पूर्ण यूरोप कई फीट बर्फ में वर्षों दबा रहा।  लम्बे दौर के हिमपात अनुभव किए गए।  कहा जाता है कि सहारा मरुस्थल से गुजरने वाली नील नदी भी जम गई थी।  इस दौरान भारतीय महाद्वीप में चक्रवाती तूफान का भीषण प्रकोप चल रहा था।  संसार में कौलरा, चिकनपौक्स जैसी बीमारियों नें वैश्विक महामारी का रूफ धारण कर लिया था।

(3(ग)  1790-1830 ई.  इस दौर का नाम Dalton Minimum है।  यह दौर वैश्विक महामारी का तीसरा भीषण दौर था।  इस दौरान कई वर्ष बिना ग्रीष्म ऋतु के गुजरे।  संभवतः इसी असामान्य परिवर्तन की वजह से इण्डोनेशिया के तम्बोरा पर्वत का दोहजार वर्षों का सबसे से भीषण ज्वालामुखी विस्फोट हुआ।  प्लेग के नए प्रकार ने महामरी का वैश्वनिक रूप को धारण किया।

वर्तमान सोलर मिनिमम का समय

2019-2020ई का यह वर्तमान दौर वैश्विक महामारी के रूप में सामने आया है।  इस दौरान पहले से उपस्थित कोविड नाम वाईरस को अनुकूलता मिली और वह अचानक सक्रीय हो गया।  ग्राफ का अध्ययन करने से लगता है कि वर्तमान सोलन मिनिमम का दौर सितम्बर माह तक रहेगा।  अतः सितम्बर तक संकट बना रहेगा।  परंतु पिछले दौर से यह भी समझा जा सकता है कि आगामी एक से दो वर्ष सहज नहीं रहेगे। 

संहिता ज्योतिष और सौर धब्बे

संहिता ग्रंथो में सौर धब्बों को सूर्य कलंक या तामस कीलक के नाम से जाना जाता है।

सौर धब्बों के अधिकता के विषय में बृहत संहिता में आदित्याचार अध्याय में जानकारी मिलती है।   थोड़ी जानकारी नारद संहिता तथा भद्रबाहु संहिता में भी है।  परंतु धब्बों के नहीं दिखने पर कुछ विचार इन ग्रंथो में देखने को नहीं मिलते।  हाँ यह अवख्य है कि उदित होते सूर्य के वर्ण का विशेष विचार नित्य अवलोन से किया जाता था और आगामी मौसम या अशुभता का विचार किया जाता था।   


निष्कर्ष

ज्योतिष एक वैज्ञानिक विषय है।  इसके तीन स्कंध हैं।  गणित, होरा और संहिता।  जब वैश्विक महामारी यह अन्य वैश्विक गंभीरता के विषय पर चर्चा करते हैं तो हमें संहिता सिद्धान्तो का प्रयोग करना चाहिए। सिद्धान्तों का प्रयोग होरा जैसे ही करना चाहिए परंतु इसका अर्थ यह नहीं संहिता के विषय में सीधे होरा के ही सिद्धान्त लागू करने लग जाएँ।

संहिता के लिए आवश्यक है कि ज्योतिषि प्रकृति से जुड़े तथा आकाश का नित्य अध्ययन करे।  इससे प्रकृति के सूक्ष्म संकेत प्राप्त किए जा सकते हैं।  और तभी संहिता संबंधित फलित सही होगा।  उदाहरण के तौर पर पिछले तीन वर्षों तक लगातार शुक्र ग्रह के अवलोकन से पता चला कि इस वर्ष शुक्र पीले रंग का आभा से चमक रहे थे। बृहत संहिता में स्पष्ट बतलाया गया है कि शुक्र का पीला चमकना जनहानी करताहै विशेष रूप से लोग श्वास कास के रोग से पीड़ित होते हैं।

सौर धब्बों का निरंतर अध्ययन करने के उपरांत ही वार्षिक पंचांगों में तथा मौसम के पूर्वानुमान पर विचार प्रस्तुत किए जाने चाहिए। 

धन्यवाद

शशिकान्त मिश्र
ग्वालियर – 11





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