“मनपसंद लग्न मुहूर्त्त का भ्रम और सीजेरियन
का कुचक्र”
ज्योतिर्विज्ञान में नए विचार और
अनुप्रयोग, अध्याय 8.9
पुष्य नक्षत्र के बाजारीकरण वाले पाठ के
तुरंत बाद ही चिकित्सकों द्वारा शुभ “मुहूर्त्त का भ्रम और सिजेरियन का कुचक्र”
वास्तव में दर्शाता है की ईश्वर की जीवन लीला प्रणाली में भी अपरोक्षरूप से
ज्योतिषी हस्तक्षेप कर रहे हैं। चिकित्सकों
या आम समाज के लोगों को कर्म के सिद्धान्त के प्रति जागरू करने वाले (ज्योतिर्विद)
ही कर्मफल चक्र में हस्तक्षेप कर रहे हैं।
इस अध्याय में सही बतलाया गया है कि “धन की
सम्पन्नता के कारण प्रसव वेदना सहने में (महिलाएँ) असमर्थ होती हैं।” (8.9.2) कोरोना
महामारी के दौरान धन सम्पन्नता की आभा समाप्त हो गई है। साथ ही चिकित्सक भी भयवश प्राकृतिक प्रसव को ही
प्रोत्साहित कर रहे हैं। अर्थात संकट की
घड़ी में वापस प्रकृति पर आश्रित हो गए हैं।
निश्चय ही अप्राकृतिक जन्म भी अकाल मृत्यु
समान होती है जिसका विश्लेषण कुण्डली द्वारा नही किया जा सकता है। अध्याय 8.9.6 में गॉवस्वेलिन का निष्कर्ष तर्क
संगत लगता है कि “सर्जिकल ऑपरेशन से हुई प्रसुति, प्रकृति के कार्य में हस्तक्षेप
है अतएव ऐसा जन्मपत्रिका से भाग्य का सही अनुमान नहीं हो सकता।”
आधान लग्न निर्माण में प्रो. सुरेश्वर
शर्मा जी का शोध निश्चय ही ज्योतिषियों को प्रयोग में लाना चाहिए जिन्होंने
वैज्ञानिक तरीके से पाया कि “जन्मपत्रिका स्थित सूर्य पर से जब चन्द्रमा गुजरता है
तो मेल ओवम या अंडाणु बनता है और जब जन्मस्थ चन्द्र पर से चन्द्रमा गुजरता है तो
फीमेल अण्डाणु बनता है।” संभवतः इसी
प्रकार के पूर्व शोधे के अनुसार ही पुत्र के दक्षिण कुक्ष और कन्यारत्न के लिए
वामकुक्ष को निर्धानित किया गया। इस तथ्य
को परखा तो नहीं परंतु आधान लग्न में चन्द्रमा का शर कितना महत्व रखता है इस पर भी
शोध करना चाहिए। जुड़वाँ सन्तान के बारे
में शोधार्थियों को 8.9.8 में उल्लिखित फकीर चन्द्रदत्त की पुस्तक PreNatal
Astrology : A Practical Exposition of the Principles of Astrological Biology को अवश्य देखना चाहिए। अक्सर ज्योतिषि
अपने विज्ञापनों में *चकित्सा ज्योतिष विशेषज्ञ* का पद स्वयं ही ग्रहण कर लेते
हैं। या सामान्य ज्यतिषीय परामर्श के
दौरान चिकित्सा क्षेत्र में भी दखल देने लगते हैं।
मुझे संशय है कि यह ज्योतिषि संभवतः एक Animal-cell
and Plant-cell के भेद को भी नहीं समझते होंगे। बहुत कम ज्योतिषी होंगे जिन्हों
ने कभी *गर्भोपनिषद* का नाम भी सुना हो। दर्शनशास्त्र आदि का तो आधुनिक
ज्योतिषियों के पास समय ही नहीं या महत्व ही नहीं। राशियों का सूक्ष्मतम विभाजन (Star-Lord,
Sub-Lord, Sub-sub…-Lord बनाकर) कर के बिना किसी तर्क के सूक्ष्म
विभागों को किसी ग्रह से जोड़ कर फलित के नए सूत्र प्रतिपादित करने में लगे रहते
है। ऐसे आधुनिक ज्योतिषियों ने विंशोत्तरी
दशा पद्धती को ही अकाट्य सत्य मान लिया है।
अन्य दशा पद्धतियों का संभवतः ठीक से ज्ञान भी न हो। ऐसे नवयुगीन ज्योतिषी सृष्टि की रचना प्रकार आदि पर कभी ध्यान नहीं
देते।
मान्यताओं के अनुसार सृष्टि के उत्पत्ति
क्रम में निरन्तर बदलाव होता रहा है। ज्योतिषियों
को समझना चाहिए कि मानसी आदि भेद से सृष्टि के सात स्तर होते हैं। विषय विस्तार हो जाए इस लिए संक्षेप में इन
भेदों को प्रस्तुत कर रहा हूँ –
प्रथम मानसी
सृष्टि
द्वितीय लिङ्गभेद-विचारहीन
सृष्टि
तृतीय एकशरीर*
(अर्धनारीश्वर Bisexual or hermaphrodites)
चतुर्थ लिङ्गभेद
(गर्भाधान केवल मानसिक प्रेरणा से जैसे कुंति पुत्र कर्ण और पाण्डव)
पञ्चम यज्ञीय
सृष्टि (यज्ञ से उत्पन्न)
षष्ठ मैथुन
सृष्टि (आजकल प्रचलित)
सप्तम जनन-शक्तिहीन
सृष्टि (आगामी जहाँ जीन्स के प्रयोग का वैज्ञानिक तरीका होगा)
जिस प्रकार विवाह के विभिन्न प्रकार है
वैसे ही सृष्टि के वृद्धि के भी विभिन्न प्रकार हैं। ज्योतिष में जातक के फलित करते समय अक्सर
श्रीराम, कृष्ण, पाण्डव, द्रौपदी आदि के जन्मकुण्डलियों का विश्लेषण करते
हैं। परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि चतुर्थ,
पंचम, षष्ठ और सप्तम प्रकार की ज्ञात सृष्टियों में जन्म की प्रक्रिया, उद्देश्य
और विज्ञान भिन्न भिन्न हैं। इस लिए जातक-शास्त्र
के सामान्य नियम भी समान रूप से लागू नहीं किए जाने चाहिए। परंतु ऐसे विचारों का समय कहाँ।
संक्षेप में कहूँगा कि ज्योतिषियों को
प्रकृति के नियम समझने चाहिए। प्रकृति के
कार्य में हस्तक्षेप करके अपने कर्मों को व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। स्वयंभू विशेज्ञ उपाधि प्राप्त करने से पहले समुचित
ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
आपकी पुस्तक का यह अध्याय अत्यन्त
महत्वपूर्ण है।
धन्यवाद।
S.K. Mishra
An Astro Enthusiast
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