पुष्य नक्षत्र का बाजारीकरण
ज्योतिर्विज्ञान में नए विचार और अनुप्रयोग
के अध्याय 8.8 पृष्ठ 562 पर मेरे विचार
आज जीवन के हम
क्षेत्र का बाजारी करण हो गया है। शिक्षा,
चिकित्सा, धर्म, राजनीति, भोजन, युद्ध... कोई भई क्षेत्र इस बाजारीकरण से अछूता
नहीं। इसी में पुष्य नक्षत्र का बाजारीकरण
भी हो चला। मेरे विचार से पुष्य नक्षत्र
का शास्त्रो में विशेष स्थान है। इसी पर पुनर्विचार करते हुए पुष्यनक्षत्र पर यह
जानकारियाँ संकलित की हैं –
आकाशीय स्थिति
खगोलीय अंग्रेजी नाम - Asellus
Australis; d Cnc
चमक – 3.9
विक्षेप (विषुवत्
वृत्त के संदर्भ में / Declination) - 18:05:04N
शर (क्रान्तिपथ के संदर्भ में / Latitude) - 00:04:35N
निरयण भोगांश (क्रान्तिपथ पर) - 104:52:03
निरयण पुष्य क्षेत्र - 93°20´ से 106°40´ तक
निरयण सूर्य प्रवेश – 19
जुलाई
तारा संख्या – 3
नक्षत्र स्वामी – शनि
देवता – गुरु
गण – देव
संज्ञा – क्षिप्र
मुख – उर्ध्वमुख
लोचन – अन्ध
नक्षत्राकृति – बाण
कर्क राशि में पुष्य नक्षत्र के इस क्षेत्र
में गुरु उच्च के होते हैं।
गुरुवार को यदि पुष्य नक्षत्र हो तो
सर्वार्थसिद्धि योग होता है। (मुहूर्त्तचिन्तामणि प्रथमोध्यायः श्लोक-२८)
पुष्य नक्षत्र से प्रथम अध्याय में कोई
निन्दनीय योग नहीं बनते। मासशून्य तिथियों
में भी पुष्य नक्षत्र का संयोग नहीं देखा जाता है। शुक्रवार को पुष्यनक्षत्र पड़े तो उत्पात योग
होता है। मृत्यु योग या अशुभ काण योग नहीं
बनता है।
क्या क्या कर सकते हैं पुष्य नक्षत्र में
पुष्य नक्षत्र क्षिप्र संज्ञक है। इनमें कामशास्त्रादि, ललित कला प्रशिक्षण,
क्रय-विक्रय, भूषण पहनना, शिल्प कि घर में लाना आदि, दवा खाना व चरसंज्ञक के सब
कार्य (यात्रा, वाहन प्रयोग, भ्रमण, पर्यटन, मन्त्र सिद्धि, वाहन मरम्मत, रत्न
तराशना, कलात्मक वस्तुओं का उत्पादन या प्रदर्शनी आदि शीघ्र निपटने नें जो भले
हों)।
ऊर्ध्व मुखी होने के कारण इनमें
राज्याभिषेक, शपथ-ग्रहण, पद-ग्रहण, शिखर निर्माण, ऊपर मंजिल बनाना, देवालय निर्माण
आदि किया जा सकता है।
मुहूर्त्त निर्णय में पुष्य नक्षत्र में मान्य
कुछ कर्म हैं – लता-वृक्षादि रोपण, राजा के दर्शन, पशुओं का क्रय विक्रय, इलाज
आरंभ करना या दवा शुरु करना, विपणि कर्म (माल लाना बेचना आदि), हाथी/वाहन आदि लाना,
गहने बनवाना खरीदना, धन आदान प्रदान करना इत्यादि
मुहूर्त्तादि में इसप्रकार चिन्तन के अलावा
बृहत्संहिता में भी पुष्य नक्षत्र का विशेष स्थान है। इस पर एक संपूर्ण अध्याय है जिसका नाम है अथ
पुष्यस्नानाध्ययः। इस अध्याय के श्लोक८२
में कहा गया है कि प्रत्येक पुष्य नक्षत्र में किया हुआ यह स्नान सुख, यश, और धन
की वृद्धि करने वाला होता है। अन्य
नक्षत्रों में इस स्नान का फल आधा होता है।
श्लोक ८४ में कहा गया है कि इस लोक में कोई उपाय नहीं है जो इस स्नान से
नष्ट न हो और कोई मांगलिक कार्य नहीं जो इससे अधिक फल देने वाला हो।
अतः मेरे विचार से पुष्य नक्षत्र का
शास्त्रो में विशेष स्थान है।
हाँ यह मानता हूँ कि इस विशेष स्थान की वजह
से बाजारी करण हो गया है और व्यापारी वर्ग इसका लाभ उठाने में कसर नहीं छोड़ रहे
हैं। इसलिए आम जनता को समझना चाहिए की
भेड़ चाल से हट कर जरूरतों के अनुसार ही आभूषण संसाधनादि खरीदना चाहिए।
धन्यवाद।
S.K. Mishra
An Astro Enthusiast
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