Saturday, 25 July 2020

पुराणों में काल यात्रा का वृत्तान्त

बटेश्वर मंदिर, भिण्ड जिला, मध्यप्रदेश
 

ककुद्मी [1]तथा रेवती की काल यात्रा

वर्तमान मनवन्तर वैवस्वत मनु का कहलाता है।  वैवस्वत मनु के पुत्र शर्याति, शर्याति के पुत्र आनर्त और आनर्त के पुत्र रेवत थे। आज से लगभग तेरह करोड़ वर्ष पूर्व उन्हों ने समुद्र के भीतर कुशस्थली नामक अपनी नगरी बसाई थी। रेवत के साम्राज्य का विस्तार उनके पुत्र ककुद्मी ने किया था। 

प्रतापी राजा ककुद्मी की सुलक्ष्णा पुत्री थी रेवती।  अत्यन्त गुणशील और सुन्दर कन्या के लिए सुयोग्य वर ढूढने के उद्देश्य से राजा कुकुद्मी अपनी पुत्री के साथ ब्रह्माजी से मिलने ब्रह्मलोक गये।  ब्रह्मलोक में पहुँच कर उन्हे कुछ क्षण की प्रतीक्षा के उपरान्त ब्रह्माजी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 

ब्रह्माजी के समक्ष राजन ने अपनी मन की बात प्रस्तुत की।  उत्तम वर प्राप्ति के निवेदन को सुन कर ब्रह्माजी हंस कर बोले – “राजन, तुमने मनसे जिन लोगोंके विषय में सोच रखा था, वे सब तो कालके गाल में जा चुके हैं।  अब उनके पुत्र, पौत्र अथवा नातियोंकी तो बात ही क्या है, उनके गोत्रों के नाम भी सुनाई नहीं पड़ते।  इतने समय में तो अपनी नगरी को छोड़े हुए तो सत्ताईस चतुर्युगों का समय बीत गया है।  इस समय बलदेवजी पृथ्वी पर विद्यमान हैं”।

रेवती को अपने पिता के साथ ब्रह्मलोक में रहते हुए पृथ्वी के तेरह करोड़ छब्बीस लाख चौबीस हजार वर्ष बीत चुके थे।  पृथ्वी का इतना लम्बा समय ब्रह्मलोक के कुछ क्षण मात्र के बराबर थे।

पिता-पुत्री ब्रह्माजी से आशीर्वाद ले कर पृथ्वीलोक पर लौटते हैं और  बलदेवजी (श्रीकृष्णजी के भाई) के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखते हैं। 

इतने वर्षों में पृथ्वी पर काफी परिवर्तन आ चुका था।  उनके राज्य पाठ का तो अस्तित्व समाप्त हो ही चुका था।  कुकुद्मी देखते हैं कि, इतने समय में मनुष्य की आयु, शरीर, ज्ञान, कर्म आदि क्षीण हो चुके थे।  बलदेवजी की कदकाठी रेवती की अपेक्षा बहुत कम थी।  अतः बलदेवजी रेवती के सिर पर अपना हल रख कर उनकी लम्बाई को अपने अनुरुप करते हैं। दोनों का विवाह सम्पन्न करा कर, राजा कुकुद्मी बदरीवन में जा कर तपस्या में लीन हो जाते हैं।

लोक परिवर्तन (पृथ्वी से ब्रह्मलोक) के कारणवश  आयु का असर कुकुद्मी और रेवती पर नहीं पड़ा था।  अवश्य ही राजा कुकुद्मी के पास उचित ज्ञान एवं व्यवस्था थी जिससे वे पृथ्वीलोक से अन्यलोक की यात्रा कर सकते थे।  उन्हों ने समुद्र के भीतर अपनी नगरी बसाई थी।  वे समय की सीमा को लाँघनें में सक्षम थे।  इससे पता चलता है कि उस समय के विज्ञान का स्वरूप जैसा भी रहा हो परंतु वह विज्ञान अत्यंत विकसित था।  काल की गति को भेद कर यात्रा करने की क्षमता उस विज्ञान में थी।   यह उपलब्धि आज के विज्ञान के लिए कल्पना मात्र है।



[1] श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्विष्णु पुराण


3 comments:

  1. Kaal ka bahut badiya vyakhian kiya hai....

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  2. Bahut Sundar🙏🏻🙏🏻

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  3. ज्ञानपूर्ण

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